इंडियन आर्मी के दिग्गजों द्वारा AI और कॉग्निटिव वॉरफेयर पर लिखे गए एक रिसर्च पेपर को NATO की प्रोजेक्ट रिपोर्ट में शामिल किया गया है। यह भारत की बढ़ती रणनीतिक ताकत और साइबर-सुरक्षा के क्षेत्र में वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।
भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल DS Hooda और लेफ्टिनेंट कर्नल Pavithran Rajan द्वारा तैयार किए गए रिसर्च पेपर 'Beyond the Kinetic: Deconstructing Warfare in the Socio-Technical-Cognitive Battlespace' ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। इस पेपर को NATO द्वारा वित्तपोषित हाइब्रिड वॉरफेयर स्टडी में कई बार उद्धृत किया गया है। यह स्टडी मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि आधुनिक युद्ध अब भौतिक हथियारों से ज्यादा सूचनाओं के प्रवाह और AI-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लड़े जा रहे हैं।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\n\nहालांकि यह एक शैक्षणिक और रणनीतिक उपलब्धि है, लेकिन फाइनेंशियल मार्केट के नजरिए से यह काफी महत्वपूर्ण है। 'नॉन-काइनेटिक' वॉरफेयर का मतलब है कि भविष्य में डिफेंस बजट का बड़ा हिस्सा सॉफ्टवेयर, साइबर-सुरक्षा और AI प्रणालियों पर खर्च होगा। आज के दौर में बौद्धिक संपदा (IP) का महत्व फिजिकल हार्डवेयर के बराबर ही हो गया है।\n\n### 'Atmanirbhar Bharat' की बढ़ती धमक\n\nयह घटनाक्रम भारत सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को और मजबूत करता है। अब फोकस सिर्फ विमान या तोप जैसे हार्डवेयर बनाने पर ही नहीं, बल्कि डिफेंस-टेक, AI और डेटा सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में भी स्वदेशी विशेषज्ञता हासिल करने पर है।\n\n### निवेश का नजरिया\n\nनिवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका किसी लिस्टेड कंपनी के शेयर प्राइस पर कोई तात्कालिक असर नहीं है। लेकिन, लॉन्ग-टर्म में उन कंपनियों के लिए रास्ते खुल रहे हैं जो डिफेंस-टेक, सॉफ्टवेयर और सिस्टम इंटीग्रेशन में काम कर रही हैं। भविष्य में सरकार द्वारा साइबर-इन्फ्रास्ट्रक्चर और AI प्रोजेक्ट्स के लिए होने वाले बजट आवंटन पर नजर रखना समझदारी होगी।
