2024 के एक्सपोर्ट विवाद के बाद भारतीय मसाला कंपनियां अब क्वालिटी और ट्रेसिबिलिटी को लेकर सख्त हो गई हैं। हालांकि यह बदलाव प्रीमियम मार्केट के लिए अच्छा है, लेकिन बढ़ती कंप्लायंस लागत का असर मुनाफे पर दिख रहा है।
भारतीय मसाला उद्योग साल 2026 में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। साल 2024 में हुए एक्सपोर्ट रिकॉल के बाद, अब बड़ी कंपनियों ने सप्लाई चेन को पूरी तरह ट्रांसपेरेंट बनाने का फैसला किया है। अब कच्चा माल खरीदने से लेकर प्रोसेसिंग तक कड़े क्वालिटी टेस्ट और ट्रेसिबिलिटी पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स को मैच किया जा सके।
कंपनियों पर असर और फाइनेंशियल ट्रेड-ऑफ
कंपनियां अब Integrated Pest Management और फार्म-लेवल की निगरानी पर भारी इन्वेस्टमेंट कर रही हैं। अमेरिका जैसे प्रमुख एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन में अपनी साख वापस पाने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था। हालांकि, टेस्टिंग और नई तकनीक में लगे भारी निवेश के कारण ऑपरेटिंग एक्सपेंस में तेजी आई है, जिसका दबाव सीधा कंपनियों के EBITDA मार्जिन पर देखने को मिल रहा है।
बाजार का हाल और खिलाड़ियों की रणनीति
Shyam Dhani Industries और Spice Lounge Food Works जैसी कंपनियां अब खुद को असंगठित सेक्टर से अलग दिखाने की कोशिश कर रही हैं। भले ही Leo Dryfruits जैसी कंपनियों का रेवेन्यू ग्रोथ शानदार रहा है, लेकिन निवेशक अब सिर्फ रेवेन्यू नहीं, बल्कि 'अर्निंग्स क्वालिटी' पर ध्यान दे रहे हैं। मार्जिन में गिरावट निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
रेगुलेटरी रिस्क और आगे का रास्ता
मिड-2026 तक आते-आते, कई विशेषज्ञों का मानना है कि FSSAI के पास अभी भी हर मसाला वैरायटी के लिए स्पष्ट सेफ्टी नॉर्म्स की कमी है। साथ ही, यूरोप और अमेरिका में बिना फिजिकल चेक के शिपमेंट रोके जाने का रिस्क बरकरार है। मानसून की अनिश्चितता और कच्चा माल मिलने में आ रही दिक्कतें भी चुनौती बनी हुई हैं। अब असली विजेता वही कंपनियां होंगी जो अपनी प्राइसिंग पावर का इस्तेमाल कर इन बढ़ती लागतों को मैनेज कर सकेंगी।
