एक नई स्टडी के मुताबिक, भारत में **84%** स्मार्टफोन यूजर्स डिवाइस प्रोटेक्शन प्लान्स के बारे में जानते हैं, लेकिन सिर्फ **6-8%** ही इन्हें खरीदते हैं। ऐसे में, फोन की कीमतें **50%** तक बढ़ने के बावजूद, लाखों लोग अचानक होने वाले बड़े रिपेयर खर्चों के जोखिम में हैं।
बढ़ती कीमतों और घटती खरीदारी का कनेक्शन?
भारतीय स्मार्टफोन बाजार में एक बड़ा गैप देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर लोग अपने स्मार्टफोन के इंश्योरेंस और प्रोटेक्शन प्लान्स के बारे में जानते हैं, वहीं दूसरी ओर बहुत कम लोग इन्हें खरीद रहे हैं। InsurTech प्लेटफॉर्म OneAssist और Hansa Research की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 84% स्मार्टफोन यूजर्स को पता है कि ऐसे प्लान्स मौजूद हैं, लेकिन असल में केवल 6-8% लोग ही इन्हें एक्टिव रखते हैं।
यह आंकड़ा तब और भी चौंकाने वाला हो जाता है, जब हम देखते हैं कि 72% यूजर्स ने कभी न कभी अपने फोन के साथ एक्सीडेंटल डैमेज का अनुभव किया है, जिसमें टूटी हुई स्क्रीन सबसे आम समस्या है। डेटा से साफ है कि कई यूजर्स बिना प्रोटेक्शन के अपने डिवाइस के साथ बड़ा फाइनेंशियल रिस्क उठा रहे हैं।
स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतों का असर
पिछले कुछ सालों में स्मार्टफोन की कीमतें 40-50% तक बढ़ गई हैं। इसका सीधा मतलब है कि स्क्रीन या मदरबोर्ड जैसे पार्ट्स के रिपेयर का खर्च अब आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है। इसके अलावा, लोग अब अपने फोन को ज्यादा समय तक इस्तेमाल कर रहे हैं, डिवाइस बदलने का औसत समय लगभग 40 महीने तक पहुंच गया है। जैसे-जैसे फोन पुराना होता है, उसके डैमेज होने की संभावना बढ़ती जाती है, ऐसे में बिना प्रोटेक्शन के रहना समझदारी नहीं लगती।
कम एडॉप्शन की असली वजह?
रिसर्च के मुताबिक, बहुत से ग्राहकों के लिए समस्या जानकारी की कमी नहीं, बल्कि भरोसे की कमी है। 44% लोग जो प्रोटेक्शन प्लान नहीं खरीदते, उनका कहना है कि इसकी कीमत ज्यादा है। इतना ही नहीं, क्लेम प्रोसेस (दावा प्रक्रिया) पर भी लोगों का भरोसा कम है। करीब 4 में से 10 ग्राहक मानते हैं कि जरूरत पड़ने पर उनका क्लेम पास नहीं होगा। इस झिझक के चलते, भारत के 65 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स में से ज्यादातर अचानक होने वाले बड़े खर्चों के लिए तैयार नहीं हैं।
रीफर्बिश्ड मार्केट में नए अवसर
यूज्ड या रीफर्बिश्ड (पुराने और ठीक किए हुए) स्मार्टफोन्स के बढ़ते बाजार और डिवाइस प्रोटेक्शन के बीच एक खास कनेक्शन है। भारत में 10 में से 4 लोग पहले ही एक प्री-ओन्ड डिवाइस खरीद चुके हैं, और यह ट्रेंड छोटे शहरों में ज्यादा देखने को मिल रहा है। स्टडी बताती है कि इस सेक्टर में प्रोटेक्शन प्लान्स एक बड़ा रोल निभा सकते हैं। जो 70% लोग अब तक रीफर्बिश्ड फोन नहीं खरीद पाए हैं, वे कहते हैं कि अगर इसमें भरोसेमंद प्रोटेक्शन कवरेज शामिल हो, तो वे इसे खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाएंगे।
आगे क्या देखना होगा?
जागरूकता और असल खरीदारी के बीच का यह अंतर ऑर्गेनाइज्ड रिटेलर्स, मैन्युफैक्चरर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए एक बड़ा मौका है। वे अपने आफ्टर-सेल्स सपोर्ट (बिक्री के बाद की सेवा) में ग्राहकों का भरोसा बढ़ा सकते हैं। बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि कंपनियां क्लेम प्रोसेस को बेहतर बनाकर कंज्यूमर का भरोसा कैसे जीतती हैं। अगर इंश्योरेंस कंपनियां और मैन्युफैक्चरर क्लेम की प्रक्रिया को आसान और ट्रांसपेरेंट बनाते हैं, तो वे आज के इस विशाल, बिना सुरक्षा वाले यूजर बेस का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींच सकते हैं।
