शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार वैश्विक गिरावट के विपरीत दिशा में बढ़ते हुए हरे निशान पर बंद हुए। Reliance Industries और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी ने बाजार को सहारा दिया, जबकि Nasdaq फ्यूचर्स में **2%** की गिरावट आई।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026 को भारतीय शेयर बाजारों ने गजब का लचीलापन दिखाया, जबकि टेक्नोलॉजी और चिप निर्माण शेयरों की भारी बिकवाली के दबाव में अंतरराष्ट्रीय सूचकांक संघर्ष करते दिखे। दुनिया भर के निवेशक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों में अपना निवेश कम कर रहे थे, वहीं घरेलू सूचकांकों ने Reliance Industries और प्रमुख बैंकिंग संस्थानों जैसे बड़े शेयरों में खरीदारी के दम पर बढ़त के साथ सत्र समाप्त किया।
ग्लोबल मार्केट में गिरावट का कारण
वैश्विक स्तर पर चिंता की मुख्य वजह Nasdaq 100 में तेज गिरावट थी, जिसके फ्यूचर्स में 2% की कमी आई। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि टेक सेक्टर में वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जो इस साल इक्विटी रैली का मुख्य चालक रहा है। सेमीकंडक्टर निर्माताओं के बीच बिकवाली का दबाव खास तौर पर तेज था, जिसमें Nvidia के शेयर प्री-मार्केट में 3% गिरे। इसके अलावा, Netflix के शेयर निराशाजनक वित्तीय पूर्वानुमान के बाद 11% लुढ़क गए, जिसने स्ट्रीमिंग और कंटेंट सेक्टर के प्रति निवेशकों की भावना को बुरी तरह प्रभावित किया।
वैश्विक कारक और कच्चे तेल का असर
भारत के बाहर के बाजार भू-राजनीतिक तनावों से और प्रभावित हुए, जिससे ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $85 प्रति बैरल के पार चली गईं। यह अप्रैल के बाद से साप्ताहिक सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी। ऊर्जा लागत में यह वृद्धि कच्चे तेल के प्रमुख आयातकों पर दबाव डालती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है और कई उद्योगों के प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
जापान का Nikkei 225, चीन का SSE Composite और हैंग सेंग जैसे प्रमुख एशियाई और यूरोपीय बाजारों में भी गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, भारतीय घरेलू बाजार पूरे दिन मजबूत बना रहा। बड़े शेयरों के प्रदर्शन के अलावा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का मजबूत होना भी एक सहायक कारक साबित हुआ, जिसने वैश्विक अस्थिरता से उत्पन्न घबराहट को कम करने में मदद की।
अगले हफ्ते के लिए निवेशक क्या देखें?
आने वाले सत्रों में निवेशक इस बात पर नजर रखेंगे कि वैश्विक टेक्नोलॉजी शेयरों की यह अस्थिरता व्यापक जोखिम भूख को कैसे प्रभावित करती है। हालांकि भारतीय बाजारों ने हाल ही में वैश्विक रुझानों से अलग प्रदर्शन करने की क्षमता दिखाई है, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता और आयात लागतों को प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, बाजार यह भी देखेगा कि क्या टेक-केंद्रित पोर्टफोलियो से अन्य क्षेत्रों में यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जारी रहता है, क्योंकि यह अक्सर भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी संस्थागत पूंजी के प्रवाह को निर्धारित कर सकता है। अगला महत्वपूर्ण कदम घरेलू कंपनियों के तिमाही प्रदर्शन का आकलन करना होगा ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वैश्विक आर्थिक दबाव के बावजूद स्थानीय कमाई की वृद्धि वर्तमान बाजार वैल्यूएशन को बनाए रख सकती है या नहीं।
