फंडिंग का फंसा जाल
देश के टॉप लीगल संस्थानों में बढ़ती फीस सिर्फ डिमांड का नतीजा नहीं, बल्कि एक खराब फंडिंग मॉडल का संकेत है। ज़्यादातर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ (NLUs) स्वायत्त (Autonomous) हैं और सीधे सरकारी सब्सिडी से दूर हैं। ऐसे में, ये यूनिवर्सिटीज़ अपने खर्चों, सुविधाओं और फैकल्टी की सैलरी निकालने के लिए छात्रों से ही मोटी फीस वसूल रही हैं। इस वजह से, फीस बढ़ाने की होड़ लगी है और सारा बोझ छात्रों पर आ रहा है।
ROI का गणित गड़बड़
जहां औसत NLUs में 5 साल की डिग्री की फीस ₹11 लाख के पार है, वहीं प्रीमियम प्राइवेट संस्थानों में यह ₹35 लाख तक जाती है। लेकिन, अच्छी सैलरी वाली लीगल जॉब्स बहुत कम हैं। टॉप ग्रेजुएट्स की औसत सैलरी ₹16 लाख से ₹20 लाख के बीच है, और ऐसी पोज़िशन कुछ ही छात्रों को मिलती हैं। ज़्यादातर छात्र कर्ज में डूबे हुए हैं। इस वजह से, छात्र बिना अपनी मर्ज़ी के भी सिर्फ पैसे कमाने के लिए बड़ी कॉर्पोरेट फर्म्स में नौकरी करने को मजबूर हैं। इससे पब्लिक इंटरेस्ट और सोशल जस्टिस जैसे ज़रूरी सेक्टर में नए टैलेंट की कमी हो रही है।
मेधावी छात्रों के लिए मुश्किल
सरकारी स्कॉलरशिप प्रोग्राम्स, खासकर अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप, धोखाधड़ी के कारण बंद हो चुके हैं। इससे कम आय वाले छात्रों के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। मेरिट वाले छात्रों को भी एडमिशन और स्कॉलरशिप के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। अब यह साफ दिख रहा है कि महंगी डिग्री का एक्सेस पैसों वालों के लिए ही आसान हो रहा है।
संस्थानों के लिए खतरा
सिर्फ फीस बढ़ाकर यूनिवर्सिटीज़ अपने खर्च पूरे कर रही हैं, जो एक हाई-रिस्क स्ट्रेटेजी है। कई नई NLUs रिसर्च या डोनेशन से पैसे कमाने के बजाय सिर्फ फीस पर निर्भर हैं। अगर फीस बढ़ती रही और डिग्री का वैल्यू कम होता गया, तो एडमिशन लेने वाले छात्रों की क्वालिटी भी गिर सकती है। अगर टॉप लॉ फर्म्स ने भी हायरिंग के नियम बदले, तो इन यूनिवर्सिटीज़ का पूरा फाइनेंशियल मॉडल खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि छात्र महंगी डिग्री लेने से पहले उसके फायदे-नुकसान पर ज़्यादा गौर करेंगे।
