भारतीय आईटी प्रोफेशनल अब अमेरिका के टाइम जोन के हिसाब से देर रात होने वाली अनिवार्य मीटिंग्स पर सवाल उठा रहे हैं। यह ट्रेंड वर्क-लाइफ बैलेंस और कर्मचारियों की मानसिक सेहत को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।
भारत के आईटी और आईटीईएस (ITeS) सेक्टर में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। अब कर्मचारी लंबे समय से चली आ रही उस परंपरा का विरोध कर रहे हैं, जिसके तहत उन्हें अमेरिकी टाइम जोन के साथ तालमेल बिठाने के लिए देर रात तक मीटिंग्स करनी पड़ती हैं। यह मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है जब अमेरिका में 'डे-लाइट सेविंग' (Daylight Saving) शिफ्ट होती है। अब यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि वर्क-लाइफ बैलेंस और लेबर राइट्स (Labor Rights) पर एक बड़ा सवाल बन चुका है।
कार्य संस्कृति में बदलाव
कई प्रोफेशनल्स का कहना है कि उनका वर्क-डे सुबह से शुरू होकर देर रात तक खिंच जाता है, जिससे उनके पर्सनल टाइम और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। कर्मचारियों का तर्क है कि यह बोझ सिर्फ भारतीय तरफ ही क्यों है? अमेरिकी टीम्स की तरफ से समय में कोई बदलाव नहीं दिखता, जिससे काम में असंतुलन पैदा हो रहा है। इसके कारण थकान और बर्नआउट (Burnout) की समस्या तेजी से बढ़ रही है।
'राइट टू डिस्कनेक्ट' की मांग
यह बहस अब केवल ऑफिस के कमरों तक सीमित नहीं रही है। कर्नाटक स्टेट आईटी/आईटीईएस एंप्लॉयीज यूनियन जैसे ग्रुप्स अब खुलकर 'राइट टू डिस्कनेक्ट' (Right to Disconnect) की वकालत कर रहे हैं। इसका मतलब है कि काम के घंटों के बाद कर्मचारियों को ऑफिस के कम्युनिकेशंस से दूर रहने का कानूनी या सांस्कृतिक अधिकार मिलना चाहिए। यह बदलाव दिखाता है कि अब कर्मचारी बेहतर कामकाजी स्थितियों के लिए मोलभाव कर रहे हैं।
इंडस्ट्री पर असर
निवेशकों के नजरिए से देखें तो, यह ट्रेंड आईटी कंपनियों की ऑपरेशनल सेहत के लिए एक महत्वपूर्ण फैक्टर है। यदि बर्नआउट के कारण एंप्लॉयी टर्नओवर बढ़ता है या प्रोडक्टिविटी गिरती है, तो कंपनियों की डिलीवरी क्वालिटी पर सीधा असर पड़ सकता है। भविष्य में अगर सरकार लेबर नियमों या 'राइट टू डिस्कनेक्ट' पर कोई कड़ा रुख अपनाती है, तो कंपनियों को अपनी एचआर पॉलिसी और स्टाफिंग स्ट्रैटेजी को पूरी तरह से बदलना पड़ सकता है।
