Indian GCC Leaders Fortune 500 C-Suites में: भारत से ग्लोबल लीडरशिप का उदय!

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian GCC Leaders Fortune 500 C-Suites में: भारत से ग्लोबल लीडरशिप का उदय!

भारत में स्थित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के टॉप एग्जीक्यूटिव्स अब Fortune 500 कंपनियों में C-suite रोल हासिल कर रहे हैं। यह दिखाता है कि अब ये सिर्फ ऑपरेशनल सपोर्ट नहीं, बल्कि ग्लोबल लीडरशिप में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, ज़्यादातर भारतीय सेंटर अभी भी AI और बिजनेस स्ट्रैटेजी के लिए निर्णय लेने के बजाय एग्जीक्यूशन पर ही केंद्रित हैं।

भारत में GCCs का बदलता स्वरूप

मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) के अंदर भारत-आधारित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की भूमिका में बड़ा बदलाव आ रहा है। इन सेंटर्स के प्रोफेशनल्स अब Fortune 500 कंपनियों में एग्जीक्यूटिव लेवल के पदों पर पहुंच रहे हैं। यह दिखाता है कि ग्लोबल कंपनियां भारतीय टैलेंट का इस्तेमाल किस तरह कर रही हैं। Verizon, Walmart, Michelin, Honeywell और Maersk जैसी बड़ी ग्लोबल कंपनियों में भारतीय लीडर्स अब टेक्नोलॉजी, डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को संभाल रहे हैं।

स्ट्रैटेजिक फैसलों में बढ़ती हिस्सेदारी

पहले भारत के GCCs को केवल कम लागत वाले एग्जीक्यूशन या सर्विस डिलीवरी हब के तौर पर देखा जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। भारत में बैठे लीडर्स ग्लोबल कस्टमर रिलेशनशिप्स, इंजीनियरिंग मैंडेट्स और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन पहलों की जिम्मेदारी ले रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय हब अब अपने पैरेंट कंपनियों के स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस के केंद्र बनते जा रहे हैं। भारत से ग्लोबल बजट और टेक्नोलॉजी रोडमैप मैनेज करके, ये एग्जीक्यूटिव्स ऑफशोर डिलीवरी और कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी के बीच की दूरी को कम कर रहे हैं।

AI मैच्योरिटी और मालिकाना हक़ की हकीकत

जहां भारतीय एग्जीक्यूटिव्स के टॉप ग्लोबल रोल्स में पहुंचने की बात साफ है, वहीं रिसर्च बताती है कि यह स्थिति सभी सेंटर्स के लिए सामान्य नहीं है। Zinnov की AI मैच्योरिटी पर आई एक स्टडी से पता चलता है कि पोटेंशियल और ऑपरेशनल अथॉरिटी के बीच अभी भी एक बड़ा गैप है। स्टडी के मुताबिक, लगभग 87% GCCs अभी भी ज़्यादातर एग्जीक्यूशन-फोकस्ड मोड में काम कर रहे हैं। इसके अलावा, इन सेंटर्स में से केवल 19% ही एंड-टू-एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मैंडेट्स को मैनेज करते हैं। कई कंपनियां अभी भी इस समस्या से जूझ रही हैं कि लोकल टीम्स एक्सपेरिमेंट, पायलट या हैकाथॉन तो कर लेती हैं, लेकिन इन प्रोजेक्ट्स को फुल-स्केल एंटरप्राइज सॉल्यूशंस में बदलने में संघर्ष करती हैं।

इनोवेशन को स्केल करने की चुनौतियां

गहरी इंटीग्रेशन में मुख्य बाधा कई मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स के मौजूदा ऑपरेटिंग मॉडल हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही लोकल लीडर्स के पास जरूरी टेक्निकल स्किल्स हों, लेकिन ग्लोबल स्ट्रैटेजी के मुख्य आर्किटेक्ट के तौर पर काम करने के लिए उनके पास अक्सर बजट और गवर्नेंस का फॉर्मल अथॉरिटी नहीं होती। डीप डोमेन एक्सपर्टीज और एंटरप्राइज-वाइड टेक्नोलॉजी फैसलों को कंट्रोल करने के स्पष्ट मैंडेट के बिना, ये सेंटर्स अक्सर ग्लोबल हेडक्वार्टर में विकसित स्ट्रैटेजीज को इम्प्लीमेंट करने पर ही फोकस करते हैं, न कि उन्हें बनाने पर। इस सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशक इस बात पर गौर कर सकते हैं कि क्या ज्यादा से ज्यादा कॉर्पोरेशन्स भारतीय टीमों को फुल बजट कंट्रोल और एंड-टू-एंड जिम्मेदारी के साथ सशक्त बनाती हैं, क्योंकि यह भारतीय GCC लैंडस्केप की मैच्योरिटी का अगला महत्वपूर्ण चरण होगा।

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