एअरलाइन फ्लीट की कमी और यात्री संख्या में धीमी ग्रोथ के कारण इंडियन एयरपोर्ट ऑपरेटर्स अब अपनी कमाई के लिए पैसेंजर ट्रैफिक के बजाय कार्गो और रियल एस्टेट जैसे नॉन-एयरोनॉटिकल साधनों पर निर्भर हो रहे हैं। FY27 में इंडस्ट्री का कुल नुकसान **₹38,000 करोड़** तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
एविएशन सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। हवाई यात्रा की लंबी अवधि की मांग मजबूत है, लेकिन फिलहाल एअरलाइंस के पास पर्याप्त विमान न होने के कारण पैसेंजर ग्रोथ में रुकावट आई है। ऐसे में एयरपोर्ट ऑपरेटर्स अपने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह से बदल रहे हैं।\n\n### इंडस्ट्री का संकट और आंकड़े\n\nFY27 के लिए एअरलाइन इंडस्ट्री का कुल नेट लॉस ₹36,000 करोड़ से ₹38,000 करोड़ के बीच रहने का अनुमान है। महंगे लीज कॉस्ट, करेंसी में उतार-चढ़ाव और फ्यूल की कीमतों में अस्थिरता के कारण एअरलाइंस अपने बेड़े का विस्तार नहीं कर पा रही हैं। इसका सीधा असर एयरपोर्ट्स की आय पर पड़ रहा है, क्योंकि अब पैसेंजर ट्रैफिक की ग्रोथ केवल 3% से 6% के बीच रहने का अनुमान है।\n\n### GMR Airports की नई रणनीति\n\nGMR Airports जैसी दिग्गज कंपनियां अब 'नॉन-एयरोनॉटिकल' इनकम पर जोर दे रही हैं। इसमें कार्गो हैंडलिंग, MRO फैसिलिटीज और एयरपोर्ट से जुड़ी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। इस कदम का मकसद फ्लाइट्स की संख्या पर निर्भरता कम करना है, क्योंकि फिलहाल घरेलू एअरलाइंस की फाइनेंशियल स्थिति काफी अनिश्चित बनी हुई है।\n\n### भारी कर्ज और विस्तार की चुनौती\n\nट्रैफिक में सुस्ती के बावजूद, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च जारी है। हालांकि, यह रणनीति जोखिम भरी है। जून 2026 तक, GMR Airports पर कुल कंसोलिडेटेड डेट ₹34,000 करोड़ था। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू ₹3,964 करोड़ और ऑपरेटिंग प्रॉफिट ₹1,568 करोड़ रहा है। कंपनी को बड़े एक्सपेंशन प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ भारी कर्ज का भुगतान भी करना है।\n\nअब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या एअरलाइंस अपने ग्राउंडेड विमानों को वापस सर्विस में ला पाती हैं और ये एयरपोर्ट कंपनियां अपने भारी कर्ज के बोझ को कैसे मैनेज करती हैं।
