केंद्र सरकार ने 2019 की नेशनल मिनरल पॉलिसी की समीक्षा के लिए **9 सदस्यीय** कमेटी का गठन किया है। इस कदम का मकसद भारत को लिथियम और डीप-सी माइनिंग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाना है, जिस पर निवेशकों की खास नजर है।
कमेटी को मिली दो महीने की डेडलाइन
यूनियन माइंस मिनिस्ट्री ने इस पूरी प्रक्रिया को तेज कर दिया है। गठित की गई 9 सदस्यीय कमेटी को अपनी सिफारिशें सौंपने के लिए सिर्फ 2 महीने का समय दिया गया है। सरकार चाहती है कि भारत की रेगुलेटरी पॉलिसी ग्लोबल सप्लाई चेन में हो रहे बदलावों के साथ कदम से कदम मिलाकर चले।
क्या बदलेगा माइनिंग सेक्टर में?
साल 2023 और 2024 में 'माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट' में जो बदलाव किए गए थे, अब नई पॉलिसी उन्हें और मजबूती देगी। इसका मुख्य फोकस लिथियम, निकल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके लिए सरकार अब प्राइवेट सेक्टर के लिए दरवाजे और चौड़े कर रही है ताकि डीप-सी माइनिंग और नई खोजों (Exploration) में निवेश बढ़ सके।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
हालांकि यह खबर माइनिंग कंपनियों के लिए अच्छी है, लेकिन निवेशकों को ग्राउंड-लेवल रियलिटी समझनी होगी।
- कैपिटल एक्सपेंडिचर: डीप-सी माइनिंग में निवेश काफी ज्यादा होता है और इसका जेस्टेशन पीरियड (प्रोजेक्ट पूरा होने का समय) भी लंबा होता है।
- पर्यावरण और मंजूरी: एनवायरमेंटल क्लीयरेंस और सरकारी मंजूरी मिलने में होने वाली देरी अक्सर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार को धीमा कर देती है।
- कमोडिटी का उतार-चढ़ाव: ग्लोबल मार्केट में कमोडिटी की कीमतों में होने वाला बदलाव मुनाफे पर सीधा असर डाल सकता है।
अगले कुछ महीनों में इस कमेटी की सिफारिशें माइनिंग सेक्टर की भविष्य की दिशा तय करेंगी। बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि प्राइवेट कंपनियां इन नए नियमों का फायदा उठाकर कितनी तेजी से अपनी प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाती हैं।
