भारत सरकार ने विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत नियमों को और सख्त कर दिया है। जून 2026 से लागू हुए इन नए नियमों से अब 14,000 से ज़्यादा NGO पर अनुपालन का दबाव बढ़ गया है। सरकार ने 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) का गठन किया है जो NGO की संपत्ति का प्रबंधन करेगा।
विदेशी फंडिंग पर कसा शिकंजा
भारत में विदेशी फंडिंग पाने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए अच्छी खबर नहीं है। सरकार ने फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट रूल्स, 2026 को 22 जून, 2026 से लागू कर दिया है। यह नियम करीब 14,500 सक्रिय NGOs पर अनुपालन का दबाव बढ़ाएंगे। वहीं, फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 अभी भी ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) के पास समीक्षा के लिए है।
'नामित प्राधिकरण' और संपत्ति का प्रबंधन
इन नए नियमों का एक अहम हिस्सा है 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) का गठन। अगर किसी NGO का रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, वह सरेंडर कर देता है या उसकी अवधि समाप्त हो जाती है, तो यह प्राधिकरण उस NGO के विदेशी चंदे और संपत्ति को अपने कब्जे में ले सकेगा।
अगर NGO नवीनीकरण (renewal) की शर्तों का पालन नहीं करता है या अपना स्टेटस खो देता है, तो उसकी संपत्ति को सरकार के पास रखा जा सकता है। यदि NGO स्थिति को ठीक नहीं कर पाता है, तो यह संपत्ति स्थायी रूप से सरकार या भारत के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में हस्तांतरित की जा सकती है। यह एक बड़ा बदलाव है, जिससे NGOs पर अपनी सभी अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करने का दबाव बढ़ गया है ताकि वे अपनी संपत्ति गंवाने से बच सकें।
सख्त अनुपालन और बढ़ी हुई देनदारी
सरकार ने 'उचित गतिविधि' (reasonable activity) की एक नई कसौटी तय की है। इसके तहत, NGOs को पिछले दो फाइनेंशियल ईयर में कम से कम ₹10 लाख विदेशी फंड का उपयोग दिखाना होगा। यह नियम उन संस्थाओं को बाहर निकालने के लिए है जो निष्क्रिय हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि विदेशी चंदा सक्रिय और सत्यापन योग्य सामाजिक कार्यक्रमों पर ही खर्च हो।
इसके अलावा, 'मुख्य पदाधिकारी' (key functionary) की परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया है। इसमें अब कोई भी ऐसा व्यक्ति शामिल है जिसका किसी संस्था के मामलों पर महत्वपूर्ण नियंत्रण हो। ऐसे व्यक्ति अब व्यक्तिगत रूप से नियमों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं, जो पिछले नियमों से एक बड़ा बदलाव है। आपराधिक दायरे में अब फंड की स्वीकृति के साथ-साथ उसके वास्तविक उपयोग को भी शामिल किया गया है।
गैर-लाभकारी क्षेत्र पर असर
यह बदलाव निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई NGOs कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहलों, अनुसंधान परियोजनाओं और स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भागीदार के रूप में काम करते हैं। सख्त FCRA अनुपालन का मतलब है कि इन साझेदारियों के लिए अब उच्च ड्यू डिलिजेंस (due diligence) की आवश्यकता होगी। NGOs को अब अपने संचालन के भौगोलिक क्षेत्र और विशिष्ट उद्देश्य को अधिक स्पष्टता से परिभाषित करना होगा। जो संस्थाएं एक साल की अनुपालन अवधि के भीतर अनुमोदित गतिविधियों के नए शेड्यूल के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती हैं, वे अपनी फंडिंग लाइसेंस खोने का सीधा जोखिम उठाएंगी।
JPC से इस बिल पर आगामी शीतकालीन सत्र तक रिपोर्ट आने की उम्मीद है। तब तक, सक्रिय नियमों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, खासकर वित्तीय रिपोर्टिंग और प्रकटीकरण मानकों पर। हितधारकों के लिए मुख्य चिंता यह होगी कि NGOs इन कड़े ऑडिट और संपत्ति-नियंत्रण आवश्यकताओं को पूरा करते हुए अपनी फंडिंग के निर्बाध प्रवाह को कैसे बनाए रख पाएंगे।
