भारत अपने टेक्सटाइल सेक्टर को 2030 तक दोगुना करके **$350 अरब** के स्तर पर ले जाने की तैयारी में है। सरकार की **₹400 अरब** की नई स्कीम और PM MITRA पार्क्स इस लक्ष्य की नींव हैं, लेकिन कपास की कीमतों में **60%** की उछाल और बदलती अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी से निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। वित्त वर्ष 2026 में करीब $190 अरब की वैल्यू से निकलकर अब सेक्टर का लक्ष्य 2030 तक $350 अरब तक पहुंचना है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए सरकार की प्रस्तावित ₹400 अरब की टेक्सटाइल एक्सपेंशन एंड एम्प्लॉयमेंट स्कीम (TEEM) एक बड़ी भूमिका निभाएगी। साथ ही, PM MITRA पार्क्स में अब तक ₹685.9 अरब का निवेश आ चुका है। Grasim Industries और Vardhman Textiles जैसी दिग्गज कंपनियां इन पार्क्स का लाभ उठाकर अपना ऑपरेशन स्केल कर रही हैं।
बढ़ती लागत और मार्जिन का दबाव
लंबी अवधि के ग्रोथ टारगेट के बीच, मैन्युफैक्चरर्स के लिए फिलहाल कच्चे माल की महंगाई बड़ी मुसीबत बनी हुई है। सितंबर 2026 तक कॉटन यार्न की कीमतें ₹400 प्रति किलो पर पहुंच गई हैं, जो साल की शुरुआत के मुकाबले 60% ज्यादा है। घरेलू कपास उत्पादन में कमी (290.91 लाख गांठ) के कारण यह दबाव बना हुआ है। राहत के तौर पर सरकार ने कपास पर 11% का इम्पोर्ट ड्यूटी हटा दिया है, फिर भी कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर चोट जारी है।
एक्सपोर्ट का बदलता गणित
सेक्टर में रिकवरी के संकेत भी हैं। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच शिपमेंट्स में 10.3% की बढ़त देखी गई है। हालांकि, अमेरिकी बाजार में कड़े नियमों (जैसे सेक्शन 301 ड्यूटी) के चलते Raymond Lifestyle और Kitex Garments जैसे बड़े एक्सपोर्टर्स अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं। अब ये कंपनियां यूरोप और उभरते बाजारों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं ताकि ट्रेड रिस्क को कम किया जा सके।
निवेशकों के लिए नजरिया
निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी कैपिटल स्पेंडिंग और इनपुट इन्फ्लेशन के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं। प्रॉफिटेबिलिटी को बरकरार रखने की क्षमता और नए बाजारों में एक्सपेंशन की रफ्तार ही इस सेक्टर के अगले दौर की दिशा तय करेगी। PM MITRA पार्क्स में कैपेसिटी कमीशनिंग और TEEM स्कीम की प्रोग्रेस पर नजर रखना जरूरी है।
