पूरे भारत में 10 राज्यों के छात्र स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं जैसे साफ पानी और बिजली की कमी के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। सरकारी आंकड़ों और सामाजिक ऑडिट से पता चलता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी कमियां हैं, जिसके चलते उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने नई जांच सूची जारी की है।
छात्रों का गुस्सा, सुविधाओं पर सवाल
देश के कम से कम 10 राज्यों के 25 से अधिक जिलों में छात्रों के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। छात्र और अभिभावक सरकारी स्कूलों में साफ पेयजल, बिजली, ठीक से काम करने वाले शौचालय और पर्याप्त शिक्षकों की कमी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से बेहद नाराज़ हैं। ये प्रदर्शन शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत तय किए गए इंफ्रास्ट्रक्चर मानकों को पूरा करने में आ रही दिक्कतों की याद दिलाते हैं।
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?
शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों, खासकर यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) के अनुसार, राष्ट्रीय औसत में सुधार के बावजूद, अलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अंतर अभी भी मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, जहां स्कूलों में बिजली पहुंचने का राष्ट्रीय औसत 93.5% है, वहीं कई उत्तरी और मध्य राज्यों में यह आंकड़ा कम है। हाल के जमीनी सामाजिक ऑडिट में भी यह अंतर साफ दिखा है। शिमला, हिमाचल प्रदेश में एक सामाजिक ऑडिट में 444 स्कूलों को कवर किया गया, जिसमें पाया गया कि 81% स्कूलों में साफ पेयजल की सुविधा नहीं है, जबकि 43% में सुरक्षा के लिए आवश्यक चारदीवारी नहीं है।
स्कूलों के बंद होने का असर?
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहे दबाव की एक वजह यह भी है कि 2018-19 और 2025-26 के शैक्षणिक वर्षों के बीच लगभग 84,000 सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों को बंद कर दिया गया है। इन स्कूलों के बंद होने के पीछे स्कूल समेकन नीतियां या कम नामांकन जैसे कारण बताए जाते हैं। इससे बचे हुए स्कूलों पर छात्रों की संख्या बढ़ी है और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ा है।
राज्यों की कार्रवाई और आगे की राह
बढ़ते असंतोष और सुविधाओं की कमी को देखते हुए, कुछ राज्य सरकारों ने प्रशासनिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग ने 20 अगस्त, 2026 को लगभग 40,000 स्कूलों के लिए 14-सूत्रीय अनुपालन जांच सूची जारी की है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पानी, बिजली और स्वच्छता में तत्काल सुधार सुनिश्चित करना है, जो स्कूलों की स्थिति की करीबी निगरानी की ओर एक कदम है।
सार्वजनिक शिक्षा भविष्य के कार्यबल के विकास की नींव है, ऐसे में इन कमियों का व्यापक आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। नीति निर्माताओं के लिए, भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राज्य सरकारें इंफ्रास्ट्रक्चर रखरखाव के लिए बजट आवंटन बढ़ाती हैं और नई अनुपालन जांच सूचियों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। 'स्कूल ठीक करो' अभियान इन कमियों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे शिक्षा परिणामों पर नज़र रखने वालों के लिए सुविधाओं के उन्नयन की गति एक प्रमुख चिंता का विषय बनी हुई है।
