भारत का स्पोर्ट्स सेक्टर तेजी से दौड़ रहा है। अनुमान है कि यह सालाना **12-14%** की रफ्तार से बढ़कर **FY26** तक **₹1.99 लाख करोड़** के आंकड़े को छू लेगा। हालांकि, अभी भी इस बाजार पर **IPL** का दबदबा बरकरार है।
बाजार में क्रिकेट का एकतरफा दबदबा
भारतीय खेल जगत का आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, लेकिन अभी भी इसमें क्रिकेट का सिक्का चलता है। अकेले IPL का एंटरप्राइज वैल्यू ₹1.97 लाख करोड़ है, जो कुल बाजार में बड़ी हिस्सेदारी रखता है। हालांकि, फुटबॉल, कबड्डी और विमेंस स्पोर्ट्स में स्पॉन्सरशिप बढ़ रही है, लेकिन इन्हें अभी भी क्रिकेट जैसा लंबा और स्थिर कॉर्पोरेट सपोर्ट मिलने का इंतजार है।
सरकारी बजट और चुनौतियां
सरकार ने खेल क्षेत्र को मजबूत करने के लिए FY27 में युवा कार्य और खेल मंत्रालय को ₹4,479.88 करोड़ का बजट आवंटित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी खर्च से काम नहीं चलेगा। नेशनल फेडरेशन के प्रोफेशनल मैनेजमेंट और संसाधनों के सही बंटवारे में सुधार करना जरूरी है, ताकि पैरा-एथलेटिक्स जैसे खेलों को भी बढ़ावा मिल सके।
इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर इस्तेमाल
खेलों की सस्टेनेबिलिटी के लिए अब नए स्टेडियम बनाने के बजाय मौजूद सुविधाओं के सही इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। सरकार एक 'नेशनल रजिस्ट्री' बनाने पर विचार कर रही है ताकि स्टेडियमों की देखरेख और उनकी उपयोगिता पर नजर रखी जा सके। इससे कैपिटल पर बेहतर रिटर्न मिल सकेगा।
मैन्युफैक्चरिंग का नया दौर
मेरठ और जालंधर जैसे पारंपरिक खेल सामग्री हब अब मॉडर्नाइजेशन की राह पर हैं। यहां के मैन्युफैक्चरर्स ग्लोबल क्वालिटी सर्टिफिकेशन पर फोकस कर रहे हैं, जिससे वे न केवल घरेलू मांग पूरी कर सकेंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय एक्सपोर्ट मार्केट में भी अपना बड़ा दखल बना पाएंगे। कुल मिलाकर, निवेशकों के लिए खेल जगत में अब विविधता और बेहतर गवर्नेंस पर नजर रखना ही सबसे फायदेमंद साबित होगा।
