सरकारी टेंडर के नियम बदले! अब कंपनी के साइज़ नहीं, 'एक्सपर्टाइज' को मिलेगी अहमियत

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AuthorAditya Rao|Published at:
सरकारी टेंडर के नियम बदले! अब कंपनी के साइज़ नहीं, 'एक्सपर्टाइज' को मिलेगी अहमियत

भारत सरकार ने कंसल्टिंग कंपनियों के लिए सरकारी टेंडर के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब कंपनी के रेवेन्यू और साइज़ से ज़्यादा, प्रोजेक्ट के लिए ज़रूरी एक्सपर्टाइज पर ध्यान दिया जाएगा। यह बदलाव **22 जुलाई** से लागू है और इसका मकसद छोटी घरेलू कंपनियों को बड़ी ग्लोबल फर्मों के सामने आने वाली मुश्किलों को दूर करना है।

सरकारी टेंडर में अब 'हुनर' की होगी कद्र!

केंद्र सरकार के व्यय विभाग (Department of Expenditure) के एक नए निर्देश के बाद, अब सरकारी मंत्रालय और विभाग कंसल्टेंट्स की हायरिंग के तरीके में बदलाव लाएंगे। 22 जुलाई से लागू हुए ये नए नियम सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स देने के तरीके को बदल देंगे। अब कंपनी के कुल साइज़ या सालाना रेवेन्यू से ज़्यादा, खास प्रोजेक्ट के लिए उनकी स्किल्स और अप्रोच को महत्व दिया जाएगा।

पहले क्या थी दिक्कत?

इससे पहले, सरकारी टेंडर्स में अक्सर फर्मों को भारी सालाना टर्नओवर या कर्मचारियों की बड़ी संख्या जैसी कड़ी शर्तों को पूरा करना होता था। इन नियमों के चलते कई छोटी, लेकिन स्पेशलिस्ट घरेलू कंपनियां बाहर हो जाती थीं, भले ही उनके पास किसी खास काम के लिए ज़रूरी एक्सपर्टाइज हो। कई बार तो ज़रूरी फाइनेंशियल क्राइटेरिया (Financial Criteria) असाइनमेंट की असल वैल्यू से 5 से 10 गुना ज़्यादा मांगे जाते थे, जिससे लोकल प्लेयर्स के लिए बिडिंग में शामिल होना नामुमकिन सा हो जाता था।

नए नियमों में क्या है खास?

नए फ्रेमवर्क में फाइनेंशियल और एक्सपीरियंस की जांच तो होगी, लेकिन अब ये प्रोजेक्ट के साइज़ के हिसाब से ज़्यादा प्रोपोर्शनेट (Proportionate) होंगे। सबसे बड़ा बदलाव इवैल्यूएशन वेटेज (Evaluation Weightage) में आया है। अब 30% से 60% स्कोर प्रपोज़्ड वर्क प्लान (Proposed Work Plan) और शामिल की गई की-स्टाफ (Key Staff) की क्वालिफिकेशन्स पर निर्भर करेगा। वहीं, कंपनी के पिछले अनुभव का वेटेज सिर्फ 5% से 10% होगा। यानी, अब इस बात को ज़्यादा अहमियत दी जाएगी कि काम कौन कर रहा है और कैसे कर रहा है, न कि कंपनी कितनी बड़ी है।

ग्लोबल 'बिग फोर' के लिए नई चुनौती?

इस बदलाव का मकसद ज़्यादा कॉम्पिटिशन को बढ़ावा देना है, जो सरकार के डोमेस्टिक फर्म्स को बूस्ट करने के लक्ष्य के अनुरूप है। हालांकि, 'बिग फोर' (Big Four) - डेलॉइट (Deloitte), पीडब्ल्यूसी (PwC), ईवाई (EY) और केपीएमजी (KPMG) जैसी बड़ी ग्लोबल कंसल्टिंग फर्मों का दबदबा रहा है, उन्हें अब प्रोजेक्ट-स्पेसिफिक मेरिट्स (Project-Specific Merits) पर ज़्यादा कॉम्पिटिशन करना होगा। इन बड़ी फर्मों के पास अभी भी इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्लोबल रिसोर्सेज जैसे फायदे हैं, इसलिए मार्केट शेयर पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वे नए इवैल्यूएशन क्राइटेरिया के हिसाब से अपने प्रपोज़ल्स को कितनी सफलतापूर्वक अडैप्ट करती हैं।

आगे क्या?

इन बदलावों की असल प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अलग-अलग सरकारी डिपार्टमेंट इन्हें कैसे लागू करते हैं। चूंकि ये गाइडलाइंस एक एडवाइज़री (Advisory) के तौर पर दी गई हैं, इसलिए सभी मंत्रालयों में इन्हें अपनाने की रफ़्तार और कंसिस्टेंसी (Consistency) अभी देखनी होगी। हो सकता है कि शुरुआत में टेंडर प्रोसेस में कुछ देरी हो, क्योंकि अधिकारी इन नए इवैल्यूएशन स्टैंडर्ड्स के अभ्यस्त होंगे। $9.36 बिलियन के भारतीय मैनेजमेंट कंसल्टिंग सेक्टर पर इसका लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट (Long-term Impact) तब ज़्यादा स्पष्ट होगा, जब नए नियमों के तहत ज़्यादा टेंडर्स जारी किए जाएंगे।

निवेशकों और इंडस्ट्री एनालिस्ट्स (Industry Analysts) को आने वाले सरकारी टेंडर्स पर नज़र रखनी चाहिए कि ये बदलाव कितने प्रभावी साबित होते हैं। मुख्य इंडिकेटर्स (Indicators) में यह देखना होगा कि क्या छोटी फर्मों को ज़्यादा सरकारी प्रोजेक्ट मिलने लगते हैं और मंत्रालय कितनी तेज़ी से अपनी टेंडर रिक्वायरमेंट्स (Tender Requirements) को नई गाइडलाइंस के हिसाब से अपडेट करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.