भारत के मोबाइल एक्सपोर्ट्स ने कमाल कर दिया है! FY26 में यह **₹2.59 लाख करोड़** के आंकड़े को पार कर गया, जो FY15 के सिर्फ **₹1,500 करोड़** के मुकाबले एक बम्पर उछाल है। सरकार की स्कीम्स और सेमीकंडक्टर पर फोकस इस जबरदस्त ग्रोथ की मुख्य वजह हैं।
दशक में 165 गुना बढ़ा एक्सपोर्ट
पिछले एक दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने गजब की तरक्की की है। वित्त वर्ष 2025-26 में मोबाइल फोन का एक्सपोर्ट अनुमानित ₹2.59 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह FY15 के ₹1,500 करोड़ के मुकाबले 165 गुना ज्यादा है। इस आंकड़े से साफ है कि भारत मोबाइल इम्पोर्ट करने वाले देश से निकलकर एक बड़ा ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया है।
डोमेस्टिक प्रोडक्शन में भारी इजाफा
एक्सपोर्ट में इस उछाल की वजह देश के अंदर प्रोडक्शन कैपेसिटी में जबरदस्त वृद्धि है। माना जा रहा है कि FY15 में जहां भारत में मोबाइल प्रोडक्शन ₹18,000 करोड़ का था, वहीं FY26 तक यह बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। सिर्फ मोबाइल ही नहीं, बल्कि ओवरऑल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का टोटल आउटपुट भी सात गुना बढ़कर FY15 के करीब ₹1.9 लाख करोड़ से FY26 में ₹13.11 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। वहीं, टोटल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट्स भी इसी अवधि में ग्यारह गुना बढ़कर ₹4.24 लाख करोड़ हो गए हैं।
सरकारी नीतियां और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम
इस शानदार परफॉर्मेंस के पीछे सरकार की वो टारगेटेड स्कीम्स हैं जिनका मकसद इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन को मजबूत करना है। मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ने बड़ी असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए ग्लोबल और डोमेस्टिक कंपनियों को आकर्षित करने पर फोकस किया है। इसी स्ट्रैटिजी का अहम हिस्सा है 'सेमिकॉन इंडिया प्रोग्राम', जिसे 2022 में सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली यूनिट्स को बढ़ावा देने के लिए लॉन्च किया गया था।
अब इस प्रोग्राम के नतीजे दिखने लगे हैं। Micron और Sahasra जैसी कंपनियां भारत में ही मेमोरी चिप्स, जैसे DRAM, NAND Flash और सॉलिड स्टेट ड्राइव्स (SSDs) बना रही हैं। इस मोमेंटम को बनाए रखने के लिए सरकार ने 'सेमिकॉन 2.0' भी लॉन्च किया है, जिसका लक्ष्य देश के अंदर चिप डिजाइन और पैकेजिंग कैपेबिलिटी को और बढ़ावा देना है।
निवेशकों के लिए खास बातें
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में इस ग्रोथ से निवेशकों के लिए नए मौके बन रहे हैं, लेकिन कुछ बातों पर नजर रखना जरूरी होगा। प्रोडक्शन में हुई वृद्धि तो साफ है, लेकिन मार्जिन की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स सिर्फ असेंबली से आगे बढ़कर चिप डिजाइन और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग जैसे हाई-वैल्यू-एडेड कामों में कितना सफल होते हैं। साथ ही, निवेशकों को 'सेमिकॉन 2.0' मिशन की प्रगति पर भी ध्यान देना चाहिए। देश में बने कंपोनेंट्स की उपलब्धता इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन को बेहतर बनाने में अहम रोल निभाएगी। प्रोजेक्ट कमीशनिंग और लोकल कंपोनेंट सोर्सिंग के स्केल पर आने वाले अपडेट्स सेक्टर की लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
