भारत के मैरीटाइम सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। नई रिपोर्ट के मुताबिक, अब कंपनियां सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के बजाय इनलैंड लॉजिस्टिक्स (Inland Logistics) को बेहतर बनाने पर फोकस कर रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि एक्सपोर्ट के कुल समय का **84%** हिस्सा कस्टम क्लीयरेंस के बाद की लॉजिस्टिक अड़चनों में बर्बाद हो जाता है।
पिछले कई सालों तक भारतीय मैरीटाइम ग्रोथ का मतलब केवल नए बर्थ बनाना और क्रेन की संख्या बढ़ाना रहा है। लेकिन FICCI और Kearney की एक ताजा स्टडी बताती है कि अब सेक्टर का नजरिया 'कैपेसिटी-फर्स्ट' से बदलकर 'लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी' पर आ गया है।
आंकड़ों की जुबानी कहानी
फाइनेंशियल ईयर 2018 से 2026 के बीच भारतीय बंदरगाहों पर कार्गो हैंडलिंग 38% बढ़कर 1,668 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गई है। प्रमुख बंदरगाहों का यूटिलाइजेशन 52% से बढ़कर 59% हो गया है। असली समस्या जगह की कमी नहीं, बल्कि बंदरगाह तक और वहां से माल पहुंचाने में होने वाली अक्षमता है।
स्टडी के अनुसार, कस्टम क्लीयरेंस में लगभग 30 घंटे लगते हैं, लेकिन इसके बाद जहाज के रवाना होने तक 158 घंटे का समय लग जाता है। यानी एक्सपोर्ट में लगने वाले कुल समय का 84% हिस्सा केवल तालमेल और लॉजिस्टिक की देरी में निकल जाता है, जो भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए एक बड़ी चुनौती है।
बड़े प्लेयर्स के लिए नई चुनौतियां
यह बदलाव Adani Ports, JSW Infrastructure और CONCOR जैसी बड़ी कंपनियों के बिजनेस मॉडल को सीधे प्रभावित कर रहा है। अब सफलता सिर्फ कैपेसिटी बढ़ाने से नहीं, बल्कि 'मल्टीमोडल कनेक्टिविटी' (Road, Rail, Sea का तालमेल) से मिलेगी।
निवेशकों को अब कंपनियों के कैपिटल स्पेंडिंग पर नजर रखनी चाहिए। कंपनियां अब इनलैंड कंटेनर डिपो, रेल कॉरिडोर और डिजिटल लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म पर ज्यादा निवेश कर रही हैं। हालांकि, फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में बढ़ते ऑपरेशनल खर्चों और ग्लोबल ट्रेड की अस्थिरता के चलते कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बन सकता है। इसके अलावा, भारत का 75% ट्रांसशिपमेंट अभी भी विदेशी हब पर निर्भर है। विझिनजम (Vizhinjam) जैसे प्रोजेक्ट्स इसे बदलने की कोशिश में हैं, लेकिन ग्लोबल शिपिंग रूट बदलना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है।
