भारत में नए लेबर कोड के तहत, 50 या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को अब अपने कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रैच (Creche) या डे-केयर (Daycare) की सुविधा देनी होगी। कंपनियां या तो खुद की क्रैच बना सकती हैं, साझा सुविधा का इस्तेमाल कर सकती हैं, या फिर ₹500 प्रति बच्चे का अलाउंस (Allowance) दे सकती हैं।
नई लेबर कोड का नया नियम!
भारत में लागू किए गए नए लेबर कोड ने वर्कप्लेस (Workplace) पर कर्मचारियों के लिए एक बड़ा बदलाव लाया है। अब 50 या उससे ज़्यादा लोगों को नौकरी पर रखने वाली हर कंपनी को 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्रैच (Crèche) या डे-केयर (Daycare) की सुविधा मुहैया करानी होगी। यह नियम मई 2026 से लागू हो चुका है।
क्रैच सुविधा के विकल्प?
कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए, सरकार ने इस नियम में काफी लचीलापन रखा है। कंपनियों को महंगा इन-हाउस (In-house) क्रैच बनाने की ज़रुरत नहीं है। वे इन विकल्पों में से कोई भी चुन सकती हैं:
- साझा क्रैच (Shared Crèche): दूसरी कंपनियों के साथ मिलकर एक कॉमन (Common) क्रैच बना सकती हैं।
- लोकेशन-बेस्ड (Location-based): कंपनी के 1 किलोमीटर के दायरे में बनी किसी मौजूदा क्रैच का इस्तेमाल कर सकती हैं।
- क्रैच अलाउंस (Crèche Allowance): अगर कंपनी खुद की या साझा क्रैच की सुविधा नहीं दे पा रही है, तो वह हर बच्चे के लिए कम से कम ₹500 प्रति माह का अलाउंस (Allowance) दे सकती है। यह अलाउंस आमतौर पर 2 बच्चों तक के लिए लागू होगा।
यह फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) खासकर इंडस्ट्रियल पार्क (Industrial Park) या टेक हब (Tech Hub) में मौजूद कंपनियों के लिए फायदेमंद है, जहां साझा इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) से लागत कम हो जाती है। दूर-दराज या रिमोट (Remote) वर्कफोर्स वाली कंपनियों के लिए भी यह अलाउंस का विकल्प मददगार है।
पैसों और अनुपालन का गणित
हालांकि, यह सुविधा कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए अच्छी है, पर कंपनियों के लिए कुछ नए फाइनेंशियल (Financial) और एडमिनिस्ट्रेटिव (Administrative) झंझट भी लेकर आई है।
- टैक्स (Tax): यह क्रैच अलाउंस टैक्सेबल इनकम (Taxable Income) माना जाएगा। इसलिए, कंपनियों को अपने पेरोल (Payroll) सिस्टम और टैक्स फाइलिंग (Tax Filing) में बदलाव करने होंगे।
- सरकारी मानक (Government Standards): अगर कंपनी फिजिकल (Physical) क्रैच सुविधा देती है, तो उसे जगह, सफाई, सुरक्षा और स्टाफिंग (Staffing) को लेकर सरकार के सख्त नियमों का पालन करना होगा। इन मानकों पर खरा न उतरने पर कंपनी पर जुर्माना लग सकता है।
निवेशकों (Investors) के लिए यह जानना ज़रूरी है कि कंपनियां इन नए खर्चों को अपने ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस (Operating Expenses) में कैसे जोड़ती हैं।
रेगुलेटरी रिस्क (Regulatory Risk) से निपटना
कंपनियों के लिए एक और पेंच फंसाने वाली बात यह है कि नए लेबर कोड के तहत 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी' (Code on Social Security) और 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड' (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code) में क्रैच को लेकर नियम थोड़े अलग हो सकते हैं। इससे एडमिनिस्ट्रेटिव (Administrative) दिक्कतें आ सकती हैं।
साथ ही, राज्य स्तर पर नियम अभी फाइनल (Final) हो रहे हैं, जिनमें केंद्र के नियमों से ज़्यादा सख़्त प्रावधान भी हो सकते हैं। इसलिए, कंपनियों को इन बदलावों के लिए तैयार रहना होगा। यह कदम जेंडर-न्यूट्रल (Gender-Neutral) वर्कप्लेस बेनिफिट्स (Workplace Benefits) की तरफ एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो भारतीय रोजगार प्रथाओं (Employment Practices) में एक लंबा बदलाव लाएगा।
