यह धीमी प्रगति केवल एक DEI (Diversity, Equity, and Inclusion) मीट्रिक नहीं है; यह एक गंभीर बिज़नेस रिस्क का संकेत है। महिलाओं के करियर में प्रगति के रुकने का यह अंतर, कॉर्पोरेट इंडिया के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लाभ (competitive advantage) में कमी ला सकता है, जो नवाचार (innovation), प्रतिभा प्रतिधारण (talent retention) और शेयरहोल्डर वैल्यू को प्रभावित करेगा, खासकर जब दुनिया भर में ESG (Environmental, Social, and Governance) पर नज़रें तेज़ हो रही हैं।
'प्लेटो' का विरोधाभास: रिपोर्ट के आंकड़े
ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन (AIMA) और KPMG-इंडिया की एक संयुक्त रिपोर्ट के नवीनतम निष्कर्ष एक चिंताजनक ट्रेंड को उजागर करते हैं: जहाँ 79% महिलाएँ लीडरशिप की भूमिकाएँ निभाने की इच्छा रखती हैं, वहीं उन्हें आगे बढ़ाने के लिए बने सिस्टम में गति धीमी पड़ रही है। 30% से ज़्यादा कंपनियों ने पिछले पांच साल में महिला लीडर्स की संख्या में कोई वृद्धि नहीं देखी है, या यहाँ तक कि गिरावट पाई है। यह आंकड़ा पिछली रिपोर्टों की तुलना में लगभग दोगुना है। यह ठहराव, महिला प्रोफेशनल्स की लगातार बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के विपरीत है, जो बताता है कि व्यक्तिगत इच्छाओं के बजाय सिस्टम की बाधाएँ मुख्य समस्या हैं।
हालांकि कंपनी अधिनियम 2013 जैसे कानूनों ने बोर्ड में महिलाओं की भागीदारी को तेज़ी से बढ़ाया है, जिससे 97% से ज़्यादा कंपनियों में कम से कम एक महिला डायरेक्टर हो गई है, लेकिन यह सफलता मैनेजमेंट के उच्च पदों तक नहीं पहुंची है। भारत में बोर्ड जेंडर डाइवर्सिटी (BGD) लगभग 18.7% है, जो एशियाई औसत से बेहतर है, पर वैश्विक बेंचमार्क से अभी भी पीछे है। चिंता की बात यह है कि केवल 11% महिला डायरेक्टर्स ही एग्जीक्यूटिव भूमिकाओं में हैं, जो बताता है कि उनकी उपस्थिति का मतलब रणनीतिक निर्णय लेने की शक्ति में महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं है।
सिस्टम की खामियाँ: मिड-करियर एट्रीशन और पे गैप
करियर की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट मिड-करियर चरण में आती है। डेटा बताता है कि लगभग तीन-चौथाई संगठनों में, लंबे समय से काम कर रही महिला कर्मचारियों में से 30% से भी कम लीडरशिप पदों तक पहुँच पाती हैं, जबकि पुरुष इससे काफी तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। अनुमान है कि भारतीय महिलाओं में से 45-50% जूनियर और मिड-लेवल के बीच कॉर्पोरेट पाइपलाइन से बाहर हो जाती हैं, जो एशियाई औसत से ज़्यादा है। इस एट्रीशन (attrition) पर सामाजिक अपेक्षाओं और देखभाल की ज़िम्मेदारियों का भारी बोझ सबसे ज़्यादा असर डालता है, जिसे 'टाइम पॉवर्टी' (time poverty) भी कहा जाता है, जो डिमांडिंग करियर ट्रैजेक्टरी के साथ टकराता है।
इसके अलावा, जेंडर पे गैप (gender pay gap) इन चुनौतियों को और बढ़ाता है। भारत में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले लगभग ₹39.8 के मुकाबले ₹100 ही मिलते हैं, यह असमानता सीनियर लेवल पर और करियर ब्रेक के बाद काफी बढ़ जाती है। खासकर IT सेक्टर में पे गैप बहुत ज़्यादा बताया गया है। यह केवल सामाजिक न्याय का मामला नहीं है; यह एक सीधा आर्थिक बोझ है, अनुमान है कि जेंडर पे गैप को खत्म करने से 2030 तक भारत की GDP में $770 अरब की बढ़ोतरी हो सकती है।
निवेश की नज़र: रणनीतिक और ESG जोखिम
महिलाओं की प्रगति में लगातार आ रहा ठहराव कॉर्पोरेट इंडिया के लिए ठोस वित्तीय और रणनीतिक जोखिम पैदा करता है। लीडरशिप लेवल पर विविध दृष्टिकोणों की कमी नवाचार (innovation) और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता को बाधित कर सकती है, खासकर तेज़ी से बदलते वैश्विक बाज़ार में। जो कंपनियाँ महिला प्रतिभाओं को बनाए रखने और आगे बढ़ाने में विफल रहती हैं, उन्हें प्रतिभा की कमी (talent drain) का गंभीर खतरा होता है, जिससे भर्ती लागत बढ़ती है और संस्थागत ज्ञान (institutional knowledge) में कमी आती है।
इसके अलावा, निवेशकों और नियामकों द्वारा ESG मानदंडों पर बढ़ते ज़ोर को देखते हुए, जेंडर डाइवर्सिटी में ठोस प्रगति एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन संकेतक (key performance indicator) बन गई है। अध्ययन बताते हैं कि बोर्ड जेंडर डाइवर्सिटी और बेहतर ESG स्कोर, पारदर्शिता और स्थिरता प्रथाओं के बीच एक सकारात्मक संबंध है। जो कंपनियाँ DEI के प्रयासों में पिछड़ती दिखती हैं, उन्हें प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचने और विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करने में चुनौतियाँ आ सकती हैं, जो तेजी से मज़बूत ESG प्रदर्शन से जुड़ रहा है। 'ओल्ड बॉयज नेटवर्क' (old boys' networks) और एग्जीक्यूटिव स्पॉन्सरशिप की कमी के कारण 'टोकेनिज़्म' (tokenism) पर निर्भरता, कार्यबल की पूरी क्षमता का उपयोग करने में एक प्रणालीगत विफलता को दर्शाती है।
आगे का रास्ता: समानता की ओर कदम
इस 'प्लेटो' को संबोधित करने के लिए संगठनात्मक डिजाइन (organizational design) में सक्रियता और समावेशी प्रथाओं (inclusive practices) की ओर रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता है। विशेषज्ञ लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम को औपचारिक बनाने, पारदर्शी, कौशल-आधारित प्रमोशन फ्रेमवर्क को बढ़ावा देने, और लचीले काम की नीतियां (flexible work policies), पैरेंटल सपोर्ट और चाइल्डकैअर सुविधाओं को लागू करने जैसे लक्षित रणनीतियों की सलाह देते हैं ताकि मिड-मैनेजमेंट में महिलाओं को बनाए रखा जा सके।
2026 का आउटलुक न्यूनतम अनुपालन (minimum compliance) से आगे बढ़ने का सुझाव देता है, जिसमें शीर्ष फर्मों के लिए स्वतंत्र महिला निदेशकों के लिए सख्त कोटे और जेंडर-संतुलित प्रमुख समितियों पर अधिक जोर दिए जाने की संभावना है। विश्लेषक मानते हैं कि जो कंपनियाँ सक्रिय रूप से जेंडर इक्विटी को संबोधित करती हैं, वेतन इक्विटी (pay equity) को बढ़ावा देती हैं, और मजबूत स्पॉन्सरशिप प्रोग्राम विकसित करती हैं, वे न केवल जोखिमों को कम कर सकती हैं, बल्कि महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ भी प्राप्त कर सकती हैं, जिससे रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) और समग्र लाभप्रदता (profitability) बढ़ सकती है। अब सवाल 'महिलाएं क्यों?' से बदलकर 'कितनी जल्दी?' हो गया है, जिसके लिए कॉर्पोरेट इंडिया से एक त्वरित और व्यापक प्रतिक्रिया की मांग है।