भारतीय कंपनियां अब लीडरशिप के लिए घर के ही टैलेंट पर भरोसा दिखा रही हैं। फाइनेंशियल ईयर **2026** में इंटरनल प्रमोशन बढ़कर **30%** हो गया है, जो पिछले साल मात्र **12%** था।
भारतीय कंपनियां अब अपनी शीर्ष लीडरशिप को चुनने के तरीके में बदलाव ला रही हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026 के डेटा पर गौर करें, तो C-suite और सीनियर लीडरशिप भूमिकाओं के लिए इंटरनल प्रमोशन की दर 30% तक पहुंच गई है। हालांकि, अभी भी 65% टॉप रोल बाहरी लोगों से भरे जा रहे हैं, लेकिन यह फाइनेंशियल ईयर 2025 के 81% के आंकड़े से काफी कम है। यह बदलाव दर्शाता है कि घरेलू फर्में अब अपने भावी लीडर्स को तैयार करने पर जोर दे रही हैं।
पाइपलाइन की कमी का चैलेंज
इस बदलाव के बावजूद, कई कंपनियों में 'शैलो लीडरशिप पाइपलाइन' (shallow leadership pipeline) की समस्या है। इसका मतलब है कि जब कोई पद खाली होता है, तो उसे भरने के लिए अंदर पर्याप्त सीनियर लीडर्स तैयार नहीं होते। ग्लोबल मार्केट की तुलना में भारतीय कंपनियों में वाइस प्रेसिडेंट से चीफ एग्जीक्यूटिव तक बनने की 'बेंच स्ट्रेंथ' अभी भी काफी कम है। इस कमी के कारण कंपनियां बाहरी हायरिंग के लिए मजबूर हो जाती हैं।
निवेशकों के लिए यह एक रिस्क है, क्योंकि बाहरी हायरिंग न केवल महंगी होती है, बल्कि इसमें समय भी ज्यादा लगता है। इससे कंपनी की स्ट्रैटेजी और मैनेजमेंट की स्थिरता पर सवाल उठते हैं, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
GCC से क्या सीखा जा सकता है?
भारत में काम कर रहे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) एक अलग मॉडल पेश कर रहे हैं, जहां इंटरनल प्रमोशन रेट 43% है। ये सेंटर्स एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जहाँ लीडर्स ऑर्गनाइजेशन के भीतर ही ग्रो करते हैं। यह साफ दिखाता है कि टैलेंट की कमी से ज्यादा समस्या कंपनी की पॉलिसी और टैलेंट डेवलपमेंट स्ट्रेटजी में है।
आने वाले समय में, निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि कंपनियां अपनी सक्सेशन प्लानिंग (succession planning) को कैसे संभालती हैं। जो कंपनियां इंटरनल टैलेंट को विकसित करने में सक्षम हैं, वे लॉन्ग टर्म में अधिक स्टेबल और एफिशिएंट साबित होंगी।
