साल 2026 (FY26) में इंडिया के IPO मार्केट ने रिकॉर्ड ₹1.9 लाख करोड़ जुटाकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। हालांकि, निवेशकों के लिए अच्छी खबर यह है कि इस बार लिस्टिंग पर औसतन सिर्फ **7%** का गेन मिला, जो पिछले साल के **29%** की तुलना में काफी कम है। ऐसे में, साफ है कि निवेशक अब थीम पर आधारित अटकलों से हटकर कंपनी के फंडामेंटल्स, कॉरपोरेट गवर्नेंस और सही वैल्यूएशन को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
IPO मार्केट में आया भूचाल!
वित्त वर्ष 2026 (FY26) में भारतीय प्राइमरी मार्केट ने 366 IPOs के जरिए ₹1.9 लाख करोड़ जुटाए, जो एक रिकॉर्ड है। लेकिन, नए इश्यू में लिस्टिंग के बाद मिलने वाला रिटर्न काफी ठंडा पड़ गया है। जहां कुल फंड जुटाने का आंकड़ा ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा, वहीं नए शेयरों में लिस्टिंग के दिन औसतन 7% का ही उछाल देखने को मिला। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 29% था। यह बड़ा बदलाव दिखाता है कि निवेशक अब हर नए इश्यू पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर रहे, बल्कि काफी सोच-समझकर पैसा लगा रहे हैं।
ओवरसब्सक्रिप्शन में भारी गिरावट!
जो दिन थे जब हाई ओवरसब्सक्रिप्शन को सफलता की गारंटी माना जाता था, वे अब बीते दिनों की बात हो गए हैं। IPOs में औसतन ओवरसब्सक्रिप्शन 39 गुना तक गिर गया, जबकि पिछले साल यह 71 गुना था। इससे पता चलता है कि बड़े निवेशक (Institutional Investors) और छोटे निवेशक (Retail Participants) दोनों ही अब कंपनी के फंडामेंटल्स, कमाई की क्वालिटी और कॉरपोरेट गवर्नेंस का बारीकी से विश्लेषण कर रहे हैं, न कि भीड़ की चाल पर चल रहे हैं। छोटे IPOs इस बदलाव से ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां औसतन सिर्फ 2% का ही गेन मिला। वहीं, मध्यम और बड़े साइज की कंपनियों ने करीब 11% का लिस्टिंग गेन औसत दर्ज किया।
लिस्टिंग के बाद का प्रदर्शन चिंताजनक
निवेशकों की यह बदली हुई सोच हाल के IPOs के लिस्टिंग के बाद के प्रदर्शन में भी साफ दिखती है। आंकड़ों के मुताबिक, हालिया IPOs में सालाना रिटर्न औसतन -17% रहा है। जिन निवेशकों ने कंपनी के बिजनेस या वैल्यूएशन पर ध्यान दिए बिना सिर्फ तेजी का पीछा किया, उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की बिकवाली जैसे बाहरी कारक भी प्राइमरी मार्केट को और अधिक सतर्क बना रहे हैं।
पैसा कहां जा रहा है?
कंपनियां अब पब्लिक से जुटाए गए पैसों का इस्तेमाल कैसे करेंगी, इस पर ज्यादा बारीकी से नजर रखी जा रही है। FY26 में जुटाए गए कुल फंड का 61% ऑफर-फॉर-सेल (OFS) रूट से आया, जिसमें मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचते हैं। वहीं, 39% फ्रेश इश्यू से आया, जिसका इस्तेमाल बिजनेस ग्रोथ के लिए होना है। जुटाए गए फंड में से 26% कर्ज चुकाने के लिए और 21% कैपिटल एक्सपेंडिचर या विस्तार के लिए तय किया गया था। निवेशक अब उन कंपनियों से कतरा रहे हैं जो शुरुआती निवेशकों को बाहर निकलने में मदद करने के लिए मार्केट का इस्तेमाल करती हैं। इसके बजाय, वे उन कंपनियों को पसंद कर रहे हैं जिनके पास अपने बिजनेस को बढ़ाने की स्पष्ट, दीर्घकालिक योजनाएं हैं।
सेक्टर-वाइज प्रदर्शन
सेक्टर की बात करें तो, फाइनेंशियल सर्विसेज ने ₹59,800 करोड़ के साथ सबसे ज्यादा फंड जुटाया। कंज्यूमर सर्विसेज और ड्यूरेबल्स में भी लगातार रुचि देखी गई। वहीं, पावर, टेलीकॉम और टेक्सटाइल्स जैसे कैपिटल-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जहां कई इश्यू को ठंडा रिस्पॉन्स मिला या लिस्टिंग पर नकारात्मक शुरुआत हुई। अगले वित्तीय वर्ष में, इश्यू की क्वालिटी, सही वैल्यूएशन और कैपिटल एलोकेशन की विश्वसनीय रणनीति ही सफलता की कुंजी बनेगी।
