Global Capability Centres (GCCs) के लिए भारत की नई पॉलिसी जल्द! ऑपरेशन्स होंगे आसान, R&D को मिलेगा बढ़ावा

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AuthorNeha Patil|Published at:
Global Capability Centres (GCCs) के लिए भारत की नई पॉलिसी जल्द! ऑपरेशन्स होंगे आसान, R&D को मिलेगा बढ़ावा

भारत सरकार इस साल ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के लिए एक राष्ट्रीय नीति लाने की तैयारी में है। इसका मकसद इन सेंटर्स के लिए रेगुलेटरी प्रक्रियाओं को आसान बनाना और अप्रूवल (Approval) को सुगम करना है। इस नीति से भारत 2030 तक 5,000 GCCs के लक्ष्य तक पहुँच सकता है।

सरकारी नई पॉलिसी का ऐलान

भारतीय सरकार ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय नीति पेश करने की तैयारी में है। इस नई नीति का मुख्य उद्देश्य इन अंतर्राष्ट्रीय बिजनेस हब के लिए परिचालन के माहौल को सरल बनाना है। भारत में पहले से ही 2,100 से अधिक GCCs सक्रिय हैं, जो 2.3 मिलियन (23 लाख) से अधिक पेशेवरों को रोजगार देते हैं। यह क्षेत्र भारत के सर्विस एक्सपोर्ट (Service Exports) में एक बड़ा योगदानकर्ता बन गया है, जिससे सालाना लगभग $100 बिलियन का रेवेन्यू (Revenue) उत्पन्न होता है। यह नई नीति, जिसके इसी साल अंतिम रूप से जारी होने की उम्मीद है, 2025-26 के यूनियन बजट (Union Budget) में की गई शुरुआती घोषणा के बाद आई है।

रेगुलेटरी बाधाओं को दूर करने की कोशिश

फिलहाल, भारत में GCCs स्थापित करने या उनका विस्तार करने वाली कंपनियों को अक्सर जटिल रेगुलेटरी माहौल से गुजरना पड़ता है। कई बार विभिन्न केंद्रीय और राज्य विभागों से 30 से अधिक अलग-अलग अप्रूवल (Approvals) की आवश्यकता होती है। इस समस्या से निपटने के लिए, प्रस्तावित नीति में एक सिंगल-विंडो क्लीयरेंस मैकेनिज्म (Single-window clearance mechanism) शामिल है, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक देरी को काफी कम करना है। इसके अतिरिक्त, सरकार बिजनेस एंटिटीज (Business entities) के लिए डिजिटल लॉकर (Digital lockers) के उपयोग पर भी विचार कर रही है। यह कंपनियों को एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल सिस्टम (Centralized digital system) के माध्यम से आवश्यक दस्तावेजों को स्टोर करने और साझा करने की अनुमति देगा। इससे बार-बार दस्तावेज जमा करने की जरूरत खत्म हो जाएगी, जिससे प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन (Project implementation) और ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational efficiency) में सुधार होगा।

बड़े शहरों से आगे विस्तार पर जोर

हालांकि बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे पारंपरिक टेक हब (Tech hubs) वर्तमान में GCCs के मामले में सबसे आगे हैं, लेकिन नई राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य टियर-II शहरों (Tier-II cities) में भी विकास को प्रोत्साहित करना है। इन क्षेत्रों में आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) विकसित करके, सरकार मुख्य मेट्रो शहरों में अक्सर देखी जाने वाली ऑपरेशनल लागत (Operational costs) और प्रतिभा दबाव (Talent pressure) को कम करने की उम्मीद करती है। नीति का फोकस अब सीधे फिस्कल इंसेंटिव्स (Fiscal incentives) से हटकर एक सक्षम वातावरण बनाने पर है, जो लॉन्ग-टर्म बिजनेस सस्टेनेबिलिटी (Long-term business sustainability) का समर्थन करता है। फिस्कल इंसेंटिव्स का प्रबंधन आमतौर पर व्यक्तिगत राज्यों द्वारा किया जाता है।

हाई-वैल्यू R&D पर फोकस

इस रणनीति में हाई-वैल्यू एक्टिविटीज (High-value activities) की ओर बढ़ने पर भी जोर दिया गया है। भारत में कई मौजूदा GCCs शुरू में बैक-ऑफिस या आईटी सपोर्ट सेंटर (IT support centers) के रूप में शुरू हुए थे। सरकार का लक्ष्य कोर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), कॉम्प्लेक्स इंजीनियरिंग (Complex engineering) और प्रोडक्ट इनोवेशन (Product innovation) की ओर ट्रांजिशन (Transition) को प्रोत्साहित करना है। एक ऐसे इकोसिस्टम (Ecosystem) को बढ़ावा देकर जो इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी क्रिएशन (Intellectual property creation) और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी सर्विसेज (Advanced technology services) का समर्थन करता है, यह नीति मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स (Multinational corporations) के ग्लोबल ऑपरेशन्स (Global operations) के भीतर भारतीय सेंटर्स द्वारा किए जाने वाले काम की गुणवत्ता को बढ़ाना चाहती है।

भविष्य की ग्रोथ और अगले कदम

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय और वित्त मंत्रालय सहित एक इंटर-मिनिस्टेरियल ग्रुप (Inter-Ministerial Group) वर्तमान में दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार कर रहा है। सरकार ने 2030 तक भारत में GCCs की संख्या को लगभग 5,000 तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। निवेशकों और हितधारकों को आगामी हितधारक परामर्श प्रक्रिया (stakeholder consultation process) पर नज़र रखनी चाहिए, जो अंतिम नियमों को निर्धारित करेगी और राष्ट्रीय ढांचे का मौजूदा राज्य-स्तरीय नीतियों के साथ कैसे तालमेल बिठाया जाएगा। इन सरलीकरण उपायों के सफल कार्यान्वयन की निगरानी यह देखने के लिए प्राथमिक संकेतक होगी कि महत्वाकांक्षी 2030 विकास लक्ष्य ट्रैक पर बना रहता है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.