भारत में AI को लेकर छिड़ी बहस: नए कानून बनें या पुराने नियमों में हो सुधार?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत में AI को लेकर छिड़ी बहस: नए कानून बनें या पुराने नियमों में हो सुधार?

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते खतरों, खासकर AI-जनित धोखाधड़ी (Fraud) और डीपफेक (Deepfake) से निपटने के लिए एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सरकार यह तय कर रही है कि क्या इस तकनीक के लिए पूरी तरह से नए कानून लाए जाएं या मौजूदा डिजिटल नियमों को ही अपडेट किया जाए।

कानूनी रणनीति पर छिड़ी बहस

जनरेटिव AI (Generative AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने भारत को डिजिटल जोखिमों को नियंत्रित करने के सबसे प्रभावी तरीके पर विचार करने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि, मौजूदा कानून पहले से ही प्रतिरूपण (Impersonation), धोखाधड़ी (Fraud) और जबरन वसूली (Extortion) जैसे अपराधों से निपटते हैं, AI-संचालित उपकरणों के उदय ने इन गतिविधियों के पैमाने और जटिलता को बढ़ा दिया है। इस स्थिति ने नीति निर्माताओं और न्यायपालिका के बीच चिंता पैदा कर दी है।

पूर्व आईटी सचिव आर. चंद्रशेखर जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का वर्तमान कानूनी ढांचा AI द्वारा सक्षम अपराधों, जैसे डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले या प्रतिरूपण, से निपटने में सक्षम है। उनके अनुसार, प्राथमिकता पूरी तरह से नए कानून बनाने के बजाय प्रवर्तन क्षमताओं (Enforcement Capabilities) और तकनीकी जागरूकता (Technological Awareness) में सुधार पर होनी चाहिए।

दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता साजन पूवैया जैसे कानूनी पेशेवर तर्क देते हैं कि जनरेटिव AI एक मौलिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। ये सिस्टम बड़े पैमाने पर सिंथेटिक टेक्स्ट, इमेज और वीडियो का उत्पादन कर सकते हैं, जो अक्सर रिकमेंडेशन एल्गोरिदम (Recommendation Algorithms) द्वारा बढ़ाए जाते हैं। इसलिए, नए कानून के समर्थकों का मानना है कि वर्तमान कानून, जिनमें से कुछ दशकों पहले बनाए गए थे, विशेष रूप से उन सामग्री को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक प्रावधानों का अभाव रखते हैं जो जैविक (Organic) के बजाय सिंथेटिक रूप से उत्पन्न होती है।

नियामक दायरा और कार्यान्वयन की चुनौतियाँ

एक संभावित AI कानून पूरे टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में जवाबदेही (Accountability) के लिए एक ढाँचा तैयार कर सकता है। चर्चाओं में AI-जनित सामग्री के अनिवार्य प्रकटीकरण (Mandatory Disclosure), हानिकारक आउटपुट के लिए देयता नियम (Liability Rules), और प्लेटफॉर्म डेवलपर्स के लिए मानकीकृत पारदर्शिता आवश्यकताओं (Standardized Transparency Requirements) के प्रस्ताव शामिल हैं। AI-उत्पादित सामग्री की वॉटरमार्किंग (Watermarking) एक सामान्य वैश्विक उपाय है। हालाँकि, विशेषज्ञों का सामना महत्वपूर्ण व्यावहारिक बाधाओं से होता है, जिसमें इन वॉटरमार्क के लिए जिम्मेदारी सौंपने और राष्ट्रीय सीमाओं के पार उत्पन्न होने वाली सामग्री के लिए क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) के प्रबंधन की चुनौती शामिल है।

न्यायपालिका और सरकार का दबाव

विधायी कार्रवाई के लिए दबाव मुख्य रूप से प्लेटफॉर्म जवाबदेही और AI-सुविधा प्राप्त गलत सूचना (Misinformation) के बढ़ते चलन को लेकर तत्काल चिंताओं से प्रेरित है। सुप्रीम कोर्ट ने AI-संचालित घोटालों के जनता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त की है, और सरकार ने संकेत दिया है कि वह AI-संचालित अपराधों को संबोधित करने के लिए विशिष्ट कानूनी उपायों पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है। यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों के संबंध में संसदीय समितियों द्वारा चल रही चर्चाओं के समानांतर हो रहा है।

विधान के अलावा, इस बात पर व्यापक सहमति है कि केवल नियामक सुधार ही समस्या का समाधान नहीं कर सकते। डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) को एक आवश्यक उपकरण के रूप में देखा जाता है ताकि नागरिकों को हेरफेर की गई सामग्री को पहचानने और स्वतंत्र रूप से जानकारी सत्यापित करने में मदद मिल सके। अंतिम दृष्टिकोण, जिसे सरकार परिष्कृत करना जारी रखे हुए है, को घरेलू प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लक्ष्य को उभरते डिजिटल नुकसान (Digital Harms) से उपयोगकर्ताओं की रक्षा करने की तत्काल आवश्यकता के साथ संतुलित करना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.