India-Bangladesh River Trade: 2026 की डेडलाइन से पहले नदी मार्ग को नई संजीवनी, लॉजिस्टिक्स लागत घटाने की तैयारी

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AuthorNeha Patil|Published at:
India-Bangladesh River Trade: 2026 की डेडलाइन से पहले नदी मार्ग को नई संजीवनी, लॉजिस्टिक्स लागत घटाने की तैयारी

दिसंबर 2026 में खत्म हो रही 1996 की गंगा जल संधि के मद्देनजर, भारत और बांग्लादेश अब ऐतिहासिक नदी मार्गों को आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना है, हालांकि **$13.5 बिलियन** के द्विपक्षीय व्यापार को रफ्तार देने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां और मौजूदा तनाव को पार पाना जरूरी है।

भारत और बांग्लादेश अब डंप पड़े औपनिवेशिक कालीन नदी व्यापार मार्गों को फिर से शुरू करने की योजना बना रहे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब 1996 की गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। इस कूटनीतिक समय सीमा के चलते अब सड़क और रेल के महंगे विकल्पों की जगह अंतर्देशीय जलमार्गों (Inland Waterways) को एक भरोसेमंद और सस्ता विकल्प माना जा रहा है।

व्यापार के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव

1972 के 'प्रोटोकॉल ऑन इनलैंड वॉटरवेज ट्रांजिट एंड ट्रेड' (PIWTT) के तहत 19 प्रमुख रूटों की पहचान की गई है, लेकिन अभी भी इनका इस्तेमाल सीमित है। व्यापार की सफलता केवल समझौतों पर निर्भर नहीं है, बल्कि ड्रेजिंग (नदी की गहराई बढ़ाना) और आधुनिक टर्मिनलों के निर्माण पर भारी निवेश की जरूरत है। असम का जोगीघोपा मल्टीमॉडल हब पूर्वोत्तर भारत को क्षेत्रीय बाजारों से जोड़ने के लिए अहम है, हालांकि मुंशीगंज जैसे टर्मिनलों पर प्रशासनिक देरी ने अभी भी व्यापारिक सुगमता की राह में रोड़े अटका रखे हैं।

भू-राजनीतिक और भौगोलिक जोखिम

नदी मार्ग के जरिए व्यापार में दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली, हुगली नदी सहित अन्य ट्रांसबाउंड्री नेटवर्क में सिल्टेशन (गाद) की बड़ी समस्या है, जिसके लिए निरंतर और महंगा रखरखाव जरूरी है। दूसरी, वर्तमान में सीमावर्ती इलाकों में व्यापार को लेकर तनाव है, जिससे सप्लाई चेन में अनिश्चितता पैदा हुई है। निवेशकों को यह भी ध्यान रखना होगा कि क्षेत्रीय राजनीतिक बदलाव लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की निरंतरता को प्रभावित कर सकते हैं।

निवेशकों के लिए आगे क्या है?

अब बाजार की नजरें संधि के नवीनीकरण के लिए होने वाली बातचीत और ड्रेजिंग-टर्मिनल अपग्रेड के लिए फंड आवंटन पर टिकी हैं। प्रोजेक्ट्स के पूरा होने का समय और PIWTT को लेकर सरकार की नई घोषणाएं यह तय करेंगी कि क्या ये दोनों देश योजना के चरण से निकलकर जमीनी हकीकत को बदल पाएंगे या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.