Agrifood Investment: भारत में एग्रीफूड सेक्टर में बंपर निवेश, **$2.1 बिलियन** के साथ ग्लोबल मार्केट में सबसे आगे

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Agrifood Investment: भारत में एग्रीफूड सेक्टर में बंपर निवेश, **$2.1 बिलियन** के साथ ग्लोबल मार्केट में सबसे आगे

भारत ने साल **2023** से लेकर अब तक एग्रीफूड सेक्टर में **$2.1 बिलियन** का भारी-भरकम फंड जुटाया है। यह निवेश न केवल उभरते बाजारों में सबसे अधिक है, बल्कि सेक्टर का फोकस अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से बदलकर डीप-टेक और रोबोटिक्स जैसे एडवांस क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रहा है।

निवेश का बढ़ता दायरा

हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ग्लोबल एग्रीफूड कैपिटल का सबसे बड़ा हब बनकर उभरा है। साल 2023 से 2025 की तीसरी तिमाही के बीच जुटाई गई $2.1 बिलियन की राशि, कुल 17 उभरते बाजारों में आए कुल $4.39 बिलियन निवेश का लगभग आधा हिस्सा है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय बाजार अब 'कैश-बर्निंग' मॉडल्स से निकलकर अधिक मैच्योर और कमर्शियल स्ट्रक्चर की ओर बढ़ रहा है।

डीप-टेक की नई लहर

पिछले एक दशक में जहां फोकस केवल डिजिटल डिलीवरी ऐप्स पर था, वहीं अब निवेश का रुख Ag BioTech, AI-इनेबल्ड हार्डवेयर, ऑटोनॉमस ड्रोन और रोबोटिक्स की तरफ मुड़ गया है। ये तकनीकें पैदावार बढ़ाने और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। निवेशकों के लिए यह बदलाव सॉफ्टवेयर से हटकर उन इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर जाने जैसा है, जिसमें एंट्री बैरियर तो ज्यादा है लेकिन लॉन्ग-टर्म में कॉम्पिटिटिव एडवांटेज भी काफी मजबूत है।

एग्जिट के बेहतर रास्ते

भारतीय बाजार की एक बड़ी खूबी यहां मौजूद एग्जिट (Exit) के विविध रास्ते हैं। यहां प्राइवेट इक्विटी बायआउट और कॉरपोरेट एक्विजिशन के साथ-साथ पब्लिक मार्केट लिस्टिंग (IPO) का विकल्प भी उपलब्ध है। यह गहराई अन्य उभरते देशों के मुकाबले भारत को काफी अलग खड़ा करती है।

निवेश के जोखिम और चुनौतियां

निवेशकों को यह समझना होगा कि डीप-टेक का रास्ता आसान नहीं है। इसमें रिसर्च साइकिल लंबी होती है, कैपिटल खर्च ज्यादा होता है और रेगुलेटरी बाधाएं भी बनी रहती हैं। सॉफ्टवेयर की तुलना में हार्डवेयर और बायोटेक में प्रॉफिटेबिलिटी आने में काफी लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा, सरकारी पॉलिसी, एक्सपोर्ट नियमों में बदलाव और सब्सिडी स्ट्रक्चर का सीधा असर इस सेक्टर की वायबिलिटी पर पड़ सकता है।

फिलहाल मार्केट की नजर इस बात पर है कि डीप-टेक स्टार्टअप्स अपने पायलट प्रोग्राम्स से कब तक फुल-स्केल कमर्शियल ऑपरेशंस तक पहुंच पाते हैं और वे किस तरह अपने बर्न रेट को कंट्रोल में रखते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.