IUCN की नई रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। बढ़ते तापमान और इंसानी गतिविधियों के चलते साल **2075** तक दुनिया के **96%** कोरल रीफ्स (मूंगे की चट्टानें) पूरी तरह तबाह हो सकते हैं, जिससे फिशरीज, टूरिज्म और कोस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर पर गहरा असर पड़ेगा।
संकट की गंभीरता
IUCN की ताजा असेसमेंट में बताया गया है कि दुनिया भर के शैलो-वॉटर कोरल रीफ्स को अब 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' कैटेगरी में डाल दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो 2075 तक ये समुद्री इकोसिस्टम पूरी तरह कोलैप्स (collapse) हो सकते हैं। मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र के बढ़ते तापमान को इसका गुनहगार माना जा रहा है।
बिजनेस और मार्केट पर असर
कोरल रीफ्स न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि ग्लोबल मार्केट के लिए भी अहम हैं।
- फिशरीज सेक्टर: समुद्र की करीब 25% बायोडायवर्सिटी इन्हीं रीफ्स पर टिकी है। मछली पालन और सीफूड बिजनेस के लिए ये एक नेचुरल नर्सरी का काम करते हैं। इनके खत्म होने से सप्लाई चेन में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है।
- टूरिज्म और रियल एस्टेट: तटीय इलाकों में पर्यटन से जुड़ी कंपनियां, रिजॉर्ट्स और क्रूज ऑपरेटर्स को तगड़ा झटका लग सकता है।
- इंस्योरेंस रिस्क: कोरल रीफ्स समुद्री लहरों और तूफानों से तटों की रक्षा करते हैं। इनके गायब होने से कोस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे इंश्योरेंस प्रीमियम में बढ़ोतरी हो सकती है।
पॉलिसी और भविष्य की दिशा
येरेवन में आयोजित COP17 समिट में पेश की गई इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इंडस्ट्रियल रन-ऑफ और ओवर-फिशिंग जैसे इंसानी कारणों ने इस तबाही की रफ्तार बढ़ा दी है। अब दुनिया भर के इन्वेस्टर्स 'ब्लू इकोनॉमी' (Blue Economy) की तरफ देख रहे हैं, जहां एनवायरमेंटल रेगुलेशन और सख्त हो सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट में उम्मीद की किरण भी है—अगर तुरंत क्लाइमेट मिटिगेशन और कंजर्वेशन पर जोर दिया जाए, तो अभी भी इस इकोसिस्टम को बचाया जा सकता है। अब ESG (Environmental, Social, and Governance) अनुपालन के लिए कोरल संरक्षण कंपनियों की लॉन्ग-टर्म प्लानिंग का मुख्य हिस्सा बन रहा है।
