ITR फाइलिंग: सिर्फ सबमिट करना काफी नहीं! 30 दिन में करें ई-वेरिफिकेशन, वरना...

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
ITR फाइलिंग: सिर्फ सबमिट करना काफी नहीं! 30 दिन में करें ई-वेरिफिकेशन, वरना...

अगर आपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल कर दिया है, तो आपका काम अभी पूरा नहीं हुआ है! इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के नियमों के मुताबिक, फाइलिंग के **30** दिनों के अंदर ई-वेरिफिकेशन (e-verification) कराना बेहद जरूरी है, वरना आपका रिटर्न अमान्य (invalid) माना जाएगा।

ई-वेरिफिकेशन क्यों है इतना ज़रूरी?

आयकर विभाग (Income Tax Department) के नए नियमों के अनुसार, सभी ई-फाइल किए गए टैक्स रिटर्न्स को जमा करने के 30 दिनों के भीतर वेरिफाई करना अनिवार्य है। अगर आप इस समय सीमा के अंदर ई-वेरिफिकेशन नहीं करते हैं, तो आपका रिटर्न रद्द माना जाएगा, जैसे कि आपने कभी फाइल ही नहीं किया था। इसका सीधा मतलब है कि आपकी फाइलिंग की तारीख खत्म हो जाएगी, आपको लेट फीस (late fees) और पेनल्टी (penalty) देनी पड़ सकती है, और अगर रिफंड (refund) आना है तो उसमें देरी हो सकती है।

सेक्शन 143(1) इंटिमेशन का महत्व

आपका रिटर्न वेरिफाई होने के बाद, यह सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर (Centralised Processing Centre) में प्रोसेस होने के लिए जाता है। इसके बाद, डिपार्टमेंट इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 143(1) के तहत आपको एक इंटिमेशन (intimation) भेजता है। यह एक ज़रूरी डॉक्यूमेंट है जिसमें टैक्सपेयर द्वारा बताई गई जानकारी और डिपार्टमेंट के रिकॉर्ड में मौजूद डेटा का मिलान किया जाता है।

यह टैक्सपेयर्स के लिए एक महत्वपूर्ण जांच है, जिससे वे किसी भी गड़बड़ी को पकड़ सकें। जैसे कि TDS (Tax Deducted at Source) का मिसमैच, जहां काटा गया टैक्स फॉर्म 26AS से मेल नहीं खाता, या फिर इंटरेस्ट इनकम (interest income) और एनुअल इन्फॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) में दर्ज फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन्स (financial transactions) से जुड़ी गलतियां।

कई बार ये गलतियां आम वजहों से होती हैं, जैसे डिविडेंड इनकम (dividend income) रिपोर्ट करना भूल जाना, सेक्शन 87A रिबेट (rebate) क्लेम करने में गलती करना, या हाउस रेंट अलाउंस (HRA) छूट के लिए मकान मालिक का PAN (Permanent Account Number) न देना। अगर आपको इंटिमेशन के बाद डिमांड नोटिस (demand notice) मिलता है, तो आपके पास दो रास्ते हैं: या तो 30 दिनों के अंदर टैक्स भरें, या अगर आपको लगता है कि डिपार्टमेंट की गणना में गलती है तो सेक्शन 154 के तहत रेक्टिफिकेशन (rectification) की प्रक्रिया शुरू करें। यह रेक्टिफिकेशन विंडो करीब 4 साल तक खुली रहती है।

डिफेक्टिव रिटर्न्स और रिफंड का प्रबंधन

टैक्सपेयर्स के लिए एक और बड़ा खतरा सेक्शन 139(9) के तहत 'डिफेक्टिव रिटर्न' (defective return) का नोटिस मिलना है। ऐसा तब होता है जब फाइलिंग अधूरी या असंगत पाई जाती है। ऐसे नोटिस के जवाब में टैक्सपेयर्स को 15 दिनों का समय मिलता है, जिसमें उन्हें गलतियों को ठीक करना होता है। इस समय सीमा के अंदर जवाब न देने पर रिटर्न को 'फाइल नहीं किया गया' माना जा सकता है, जिससे लेट फीस लग सकती है और आगे जांच भी हो सकती है।

कंप्लायंस (compliance) के अलावा, रिफंड्स को मैनेज करने के लिए पोस्ट-फाइलिंग पीरियड बहुत महत्वपूर्ण है। डिपार्टमेंट रिफंड्स को प्री-वैलिडेटेड (pre-validated) बैंक अकाउंट्स के ज़रिए प्रोसेस करता है, जो PAN और आधार से लिंक होते हैं। अगर बैंक अकाउंट प्री-वैलिडेटेड नहीं है या उसमें कोई गड़बड़ है, तो रिफंड पेमेंट अक्सर फेल हो जाता है। ऐसे में 'रिफंड रीइश्यू' (refund reissue) की प्रक्रिया में मैनुअल हस्तक्षेप की ज़रूरत पड़ती है। ई-फाइलिंग पोर्टल पर अपने रिटर्न की स्थिति पर नज़र रखने से आप इन विफलताओं को जल्दी पकड़ सकते हैं और इंटरेस्ट लॉस (interest loss) या प्रोसेसिंग डिले (processing delays) से बचने के लिए अपने अकाउंट डिटेल्स को अपडेट कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.