ITAT चेन्नई ने एक महत्वपूर्ण फैसले में टैक्सपेयर को राहत दी है। **₹85.30 लाख** के कैश गिफ्ट मामले में ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर डोनर की पहचान और ट्रांजेक्शन के ठोस सबूत मौजूद हैं, तो विभाग उसे केवल संदेह के आधार पर गलत नहीं ठहरा सकता।
इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) चेन्नई ने ₹85.30 लाख के कैश गिफ्ट मामले में टैक्सपेयर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इनकम टैक्स विभाग की उस कोशिश को खारिज कर दिया, जिसमें विभाग इन पैसों को 'अनएक्सप्लेन्ड इनकम' (अघोषित आय) के रूप में जोड़ना चाहता था। यह मामला 2016-17 के फाइनेंशियल ईयर से जुड़ा है।
विवाद की जड़: सेक्शन 68
टैक्स अधिकारियों ने इन कैश डिपॉजिट्स को इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 68 के तहत 'अनएक्सप्लेन्ड कैश क्रेडिट' माना था। विभाग का तर्क था कि गिफ्ट देने वालों की आय इतनी नहीं है कि वे इतनी बड़ी रकम का गिफ्ट दे सकें।
सबूतों की ताकत
टैक्स कानून के मुताबिक, किसी भी गिफ्ट को सही साबित करने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं: डोनर की पहचान, ट्रांजेक्शन की प्रामाणिकता और डोनर की आर्थिक क्षमता। टैक्सपेयर ने इस मामले में:
- फॉर्मल गिफ्ट डीड्स पेश किए।
- डोनर्स के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की कॉपी दी।
- सभी संबंधित व्यक्तियों के फाइनेंशियल स्टेटमेंट जमा किए।
आईटी विभाग द्वारा सेक्शन 133(6) के तहत नोटिस जारी करने पर खुद डोनर्स ने सामने आकर इन ट्रांजेक्शंस की पुष्टि की। ट्रिब्यूनल ने माना कि टैक्सपेयर ने कानून द्वारा जरूरी 'बर्डन ऑफ प्रूफ' को पूरी तरह निभा दिया है।
संदेह बनाम ठोस सबूत
ITAT ने स्पष्ट किया कि जब टैक्सपेयर के पास स्पष्ट रिकॉर्ड मौजूद हों, तो विभाग सिर्फ शक के आधार पर दावों को खारिज नहीं कर सकता। अगर विभाग को डोनर के फंड के सोर्स पर कोई डाउट था, तो उन्हें डोनर के खिलाफ अलग से जांच करनी चाहिए थी, न कि गिफ्ट लेने वाले व्यक्ति को बेवजह पेनलाइज करना चाहिए था। यह फैसला टैक्सपेयर्स के लिए एक बड़ी मिसाल है कि मजबूत डॉक्यूमेंटेशन किसी भी बड़ी स्क्रूटनी से बचने का सबसे बड़ा हथियार है।
