ISRO की नौ कर्मचारी यूनियंस ने सरकारी नेतृत्व से उन रिपोर्ट्स पर स्पष्टीकरण मांगा है जिनमें लॉन्च व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग को पूरी तरह प्राइवेट सेक्टर को सौंपने की बात कही गई है। यह विरोध भारत के **$44 बिलियन** के स्पेस इकोनॉमी लक्ष्य के लिए एक बड़ा रिस्क पैदा कर सकता है।
विवाद की जड़ क्या है?
भारत के स्पेस सेक्टर में एक बड़ा नीतिगत गतिरोध शुरू हो गया है। 4 सितंबर 2026 को 5,000 से अधिक ISRO कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली नौ यूनियंस ने चेयरमैन वी. नारायणन को एक औपचारिक पत्र सौंपा है। यह कदम 21 अगस्त 2026 को IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका द्वारा दिए गए एक बयान के बाद उठाया गया है।
प्राइवेट सेक्टर की भूमिका पर बवाल
IN-SPACe प्रमुख ने सुझाव दिया था कि ISRO को धीरे-धीरे लॉन्च व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग से बाहर हो जाना चाहिए और यह काम प्राइवेट इंडस्ट्री को सौंप देना चाहिए। कर्मचारियों का तर्क है कि इससे ISRO केवल एक रिसर्च यूनिट बनकर रह जाएगा और वर्षों से विकसित की गई उनकी तकनीकी विशेषज्ञता खतरे में पड़ सकती है।
निवेशकों के लिए रिस्क
भारत सरकार का लक्ष्य 2033 तक अपनी स्पेस इकोनॉमी को $44 बिलियन तक ले जाना है। यह पूरा रोडमैप इस बात पर टिका है कि ISRO की टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राइवेट प्लेयर्स को सुचारू रूप से हैंडओवर किया जाएगा। यदि कर्मचारी यूनियंस के विरोध के कारण इसमें देरी होती है, तो उन प्राइवेट एयरोस्पेस कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है जो इन पार्टनरशिप्स के भरोसे अपना बिजनेस प्लान बना रही हैं।
मुख्य प्रोजेक्ट्स पर नजर
यूनियंस ने PSLV, LVM3, और SSLV जैसे प्रमुख रॉकेट्स के भविष्य और कुलसेकरपट्टिनम स्पेसपोर्ट जैसी नई सुविधाओं के संचालन पर चिंता जताई है। फिलहाल, पूरी नजर इस बात पर है कि डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस इस आंतरिक गतिरोध को कैसे सुलझाता है, क्योंकि किसी भी देरी का असर सीधे तौर पर देश के महत्वाकांक्षी स्पेस मिशन के टाइमलाइन पर पड़ेगा।
