IIT-Mandi के रिसर्चर्स ने हिमाचल प्रदेश में **9** ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की है जो 'वॉटर बॉम्ब' की तरह खतरनाक साबित हो सकती हैं। इन इलाकों में आपदा प्रबंधन के लिए सरकार ने **₹105 करोड़** के फंड की मांग की है, क्योंकि इससे वहां चल रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और बस्तियों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
हिमाचल प्रदेश में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो अब एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। आईआईटी मंडी की स्टडी के मुताबिक, साल 2025 तक 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली झीलों की संख्या बढ़कर 2,076 हो गई है, जबकि एक दशक पहले यह आंकड़ा 1,366 था। इस तेजी से पिघलाव के कारण 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स' (GLOFs) का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और हाइड्रोपावर सेक्टर पर असर
हिमालयी क्षेत्र में मौजूद कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सड़कें और पुल अब सीधे खतरे की जद में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन झीलों के अस्थिर होने से भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ सकती है। कंपनियों को अब ऊंचे इंश्योरेंस प्रीमियम और सुरक्षा के कड़े नियमों का सामना करना पड़ सकता है। गेपांग गाठ, कासंग और कालीकुंड जैसी झीलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जो स्थानीय बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है।
सरकार की क्या है तैयारी?
इस आपदा से निपटने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार केंद्र से ₹105 करोड़ की मदद मांग रही है। इसका मुख्य उद्देश्य एडवांस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (Early Warning System) लगाना है। यह उन कंपनियों के लिए एक बड़ा अवसर हो सकता है जो डिजास्टर मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट मॉनिटरिंग में काम करती हैं। राज्य सरकार अब 681 झीलों को रिस्क के आधार पर कैटेगराइज करने की योजना बना रही है, जिससे भविष्य में निर्माण कार्यों और लैंड-यूज़ पॉलिसी में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
