IIT कैंपस में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, **40%** छात्रों को प्रोफेशनल काउंसलिंग की जरूरत है, जो पिछले दो सालों में दोगुना हो गई है। तेजी से बढ़ते कैंपस और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव ने एडमिनिस्ट्रेशन और पॉलिसी में बदलाव की मांग तेज कर दी है।
भारत के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों (IITs) में छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य अब एक बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। वेलनेस प्लेटफॉर्म YourDost के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 एकेडमिक ईयर में थेरेपी और काउंसलिंग की जरूरत महसूस करने वाले छात्रों की संख्या 40% तक पहुंच गई है। महज दो साल पहले यह आंकड़ा 20% पर था, जो एक गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
बढ़ते दबाव और संस्थानों की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि संस्थानों का तेजी से विस्तार और सपोर्ट सिस्टम के बीच का अंतर इस संकट का बड़ा कारण है। कई IITs ने अपनी सीट क्षमता बढ़ाई है, लेकिन इसके मुकाबले हॉस्टल फैसिलिटीज और काउंसलिंग सेंटर का विकास काफी धीमा रहा है। IIT-Hyderabad का उदाहरण सामने है, जहाँ 2021 से 2025 के बीच काउंसलिंग की मांग में 74% का भारी इजाफा हुआ है। अत्यधिक पढ़ाई का बोझ, प्रतिस्पर्धा और माता-पिता की उम्मीदें छात्रों की एंजायटी और तनाव को और बढ़ा रही हैं।
सरकारी दखल और बड़े सुधार
इस गंभीर समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में एक 'नेशनल टास्क फोर्स' का गठन किया है, ताकि उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य के लिए मानक प्रोटोकॉल बनाए जा सकें। इसके अलावा, IIT खड़गपुर ने छात्रों का दबाव कम करने के लिए 'कंटीन्यूअस टेस्टिंग' और 'सप्लीमेंट्री एग्जाम' जैसे नए मॉडल लागू किए हैं। IIT बॉम्बे भी अपने कैंपस लाइफ पॉलिसी को बेहतर बनाने पर काम कर रहा है।
अब आगे क्या?
छात्रों और अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अकादमिक उत्कृष्टता और मानसिक शांति के बीच संतुलन बनाना है। IIT बॉम्बे और IIT दिल्ली जैसे संस्थानों में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों ने 'इंस्टिट्यूशनल अकाउंटेबिलिटी' को बहस के केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस पर है कि ये नए सुधार जमीनी स्तर पर कितने कारगर साबित होते हैं और क्या संस्थान भविष्य में छात्रों की बढ़ती आबादी को सुरक्षित माहौल दे पाएंगे।
