IBC रिकवरी में सुधार, पर देरी से क्रेडिटर परेशान | Q1FY27 में 28.6% हुई वसूली

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AuthorAditya Rao|Published at:
IBC रिकवरी में सुधार, पर देरी से क्रेडिटर परेशान | Q1FY27 में 28.6% हुई वसूली

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत वित्तीय क्रेडिटर (Financial Creditors) ने वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही में अपने स्वीकृत दावों (Admitted Claims) का **28.6%** वसूल किया है। यह पिछली तिमाही के **22.8%** से एक सुधार है। हालांकि, इस सुधार के बावजूद, सिस्टम अभी भी लंबे समाधान समय (Resolution Timelines) से जूझ रहा है, जिसमें लगभग **75%** मामले **270** दिनों की सीमा को पार कर चुके हैं। इस लगातार देरी से संपत्ति का मूल्य कम हो रहा है और ऋणदाताओं (Lenders) को भारी नुकसान हो रहा है।

IBC के तहत क्रेडिटर को कितना मिला?

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत, वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही में वित्तीय क्रेडिटर को उनके कुल दावों का 28.6% वापस मिला है। पिछले वित्तीय वर्ष की आखिरी तिमाही में यह आंकड़ा 22.8% था। यह आंकड़ों में क्रमबद्ध सुधार एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह IBC की शुरुआत से अब तक की कुल रिकवरी दर 30.5% से कम है। इसका मतलब है कि ऋणदाताओं को अभी भी अपने लोन पर बड़ा 'कट' (Haircut) यानी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

Q1FY27 के आंकड़े क्या कहते हैं?

Q1FY27 के दौरान, वित्तीय क्रेडिटर ने ₹12,443 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹3,557 करोड़ की वसूली की। इन समाधानों (Resolutions) से कंपनी के लिक्विडेशन वैल्यू (Liquidation Value) का 136.7% प्राप्त हुआ। यह इस बात की पुष्टि करता है कि कंपनी को लिक्विडेट करने की तुलना में खरीदार ढूंढना या समाधान योजना (Resolution Plan) लागू करना क्रेडिटर के लिए बेहतर है, क्योंकि लिक्विडेशन अक्सर कंपनी के परिचालन मूल्य (Operational Value) को नष्ट कर देता है।

देरी और लिक्विडेशन का संकट

हालांकि, इन्सॉल्वेंसी इकोसिस्टम अभी भी कई समस्याओं से जूझ रहा है। क्रेडिटर के लिए सबसे बड़ी चिंता केसों को बंद करने में लगने वाला समय है। जून 2026 तक, कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRPs) के लगभग 75% मामले 270 दिनों की निर्धारित सीमा को पार कर चुके थे, जो मूल रूप से समाधान के लिए अधिकतम समय सीमा मानी जाती थी। अब एक केस को हल करने में औसतन 757 दिन लग रहे हैं। इस लंबी देरी के कारण संपत्ति खराब हो जाती है, खरीदार ढूंढना मुश्किल हो जाता है और अंततः वसूली की राशि कम हो जाती है।

छोटे केसों का समाधान, बड़े केसों में दिक्कत?

पहली तिमाही में स्वीकृत समाधान योजनाओं की संख्या में 92% की भारी वृद्धि देखी गई, लेकिन प्रति केस दावों का औसत आकार कम हुआ है। इससे पता चलता है कि छोटे मामलों को निपटाया जा रहा है, लेकिन सिस्टम बड़े और जटिल स्ट्रेस्ड खातों (Stressed Accounts) से कुशलतापूर्वक निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसके अलावा, लिक्विडेशन अभी भी एक प्रमुख परिणाम बना हुआ है, जो कुल बंद हुए मामलों का 33.5% है। यह इस वास्तविकता को दर्शाता है कि कई कंपनियां दिवालियापन प्रक्रिया (Insolvency Process) में तब पहुंचती हैं जब उनकी वित्तीय और परिचालन स्थिति गंभीर रूप से खराब हो चुकी होती है।

पर्सनल गारंटी से रिकवरी का हाल

पर्सनल गारंटी (Personal Guarantors) से वसूली एक और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है। कानूनी ढांचा मौजूद होने के बावजूद, पर्सनल गारंटी से रिकवरी बेहद कम, लगभग 1% है, और बहुत कम पुनर्भुगतान योजनाएं (Repayment Plans) स्वीकृत हुई हैं। यह गारंटी देने वालों को जवाबदेह ठहराने के कानूनी इरादे और जमीनी हकीकत के बीच एक अंतर को उजागर करता है।

निवेशक और ऋणदाता नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की पीठों की क्षमता और गति में सुधार की उम्मीद कर रहे हैं, क्योंकि न्यायिक बाधाएं (Judicial Bottlenecks) इन देरी का मुख्य कारण बनी हुई हैं। आने वाली तिमाहियों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सिस्टम लिक्विडेशन से हटकर तेजी से, मूल्य-संरक्षण (Value-Preserving) समाधानों की ओर बढ़ पाता है, खासकर बड़े स्ट्रेस्ड खातों के लिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.