Infosys ESOPs 1994: जानिए कैसे शुरुआती कर्मचारियों के बने लाखों-करोड़ों के मालिक!

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AuthorMehul Desai|Published at:
Infosys ESOPs 1994: जानिए कैसे शुरुआती कर्मचारियों के बने लाखों-करोड़ों के मालिक!

Infosys के 1994 के ESOP प्लान ने अपने कर्मचारियों के भविष्य को पूरी तरह बदल दिया। कंपनी के IPO के बाद शुरू हुई इस स्कीम ने **1999** तक कई कर्मचारियों, यहाँ तक कि सपोर्ट स्टाफ को भी लखपति (Millionaire) बना दिया। यह भारत में लॉन्ग-टर्म इक्विटी ओनरशिप से वेल्थ क्रिएशन का एक ऐतिहासिक उदाहरण है।

Detailed Coverage

Infosys की कहानी भारतीय कॉर्पोरेट कल्चर के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई है। आज जहां कई कंपनियां टैलेंट को आकर्षित करने के लिए स्टॉक ऑप्शन देती हैं, वहीं Infosys 1990s में ही अपनी इस सुविधा को पूरे संगठन में फैला चुकी थी। यह पहल कंपनी की 1993 की इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के ठीक बाद शुरू हुई थी, जिसकी कीमत ₹95 प्रति शेयर थी।

मैनेजमेंट से परे वेल्थ का विस्तार

Infosys के इस प्रोग्राम की खास बात इसकी समावेशी प्रकृति थी। सीनियर एग्जीक्यूटिव्स या टेक्निकल लीड्स तक सीमित रखने के बजाय, ESOP पूरे वर्कफोर्स तक पहुँचा। Infosys के पूर्व CFO, T.V. Mohandas Pai के अनुसार, इस स्ट्रैटेजी ने कंपनी के अंदरूनी कल्चर को मौलिक रूप से बदल दिया। जब Infosys ने मार्च 1999 में Nasdaq एक्सचेंज पर लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनकर इतिहास रचा, तब तक शेयरों की वैल्यू बढ़कर लगभग ₹8,100 हो चुकी थी।

इस जबरदस्त बढ़ोतरी ने करीब 1,800 कर्मचारियों को डॉलर-मिलियनेयर बना दिया। इसका असर इतना व्यापक था कि इसमें ड्राइवर्स और इलेक्ट्रीशियन जैसे सपोर्ट रोल्स के लोग भी शामिल थे, जिन्होंने कंपनी के ग्रोथ फेज के दौरान अपने अलॉटेड स्टॉक को होल्ड किया था। इसने भारत में एक अनोखी स्थिति पैदा की, जहाँ पारंपरिक सैलरी स्ट्रक्चर के बजाय लॉन्ग-टर्म होल्डिंग से वेल्थ जेनरेट हुई।

स्टेकहोल्डर फिलॉसफी

यह वेल्थ-शेयरिंग मॉडल को-फाउंडर N.R. Narayana Murthy के विजन से प्रेरित था। उनके मैनेजमेंट फिलॉसफी पर जोर दिया गया कि सस्टेनेबल सफलता सभी स्टेकहोल्डर्स के हितों को संतुलित करने से आती है, जिसमें वे कर्मचारी भी शामिल हैं जो बिजनेस के दैनिक ऑपरेशन्स में योगदान करते हैं। एम्प्लॉई इंसेटिव्स को कंपनी की लॉन्ग-टर्म वैल्यूएशन के साथ अलाइन करके, Infosys ने अपने शुरुआती सालों में एम्प्लॉई रिटेंशन और कमिटमेंट के हाई लेवल को बढ़ावा दिया।

निवेशकों के लिए ऐतिहासिक संदर्भ

आधुनिक निवेशकों के लिए, Infosys का उदाहरण इक्विटी ओनरशिप की लॉन्ग-टर्म संभावनाओं को उजागर करता है। हालांकि 1990s का भारतीय शेयर बाजार आज से काफी अलग था, यह घटना इस बात का अध्ययन बनी हुई है कि कैसे एक कंपनी की ग्रोथ, एम्प्लॉई स्टॉक प्लान्स के वैल्यू को बढ़ा सकती है।

आधुनिक भारतीय कंपनियों में वर्तमान ESOP स्कीम्स को देखने वाले निवेशक अक्सर 'डिल्यूशन' फैक्टर पर नज़र रखते हैं, क्योंकि कर्मचारियों को नए शेयर जारी करने से मौजूदा शेयरधारकों के लिए प्रति शेयर आय (EPS) कम हो सकती है। हालांकि, Infosys के मामले को अक्सर ऐसे परिदृश्य के रूप में उद्धृत किया जाता है जहाँ कंपनी की तेज ग्रोथ और मार्केट सक्सेस ने डिल्यूशन को काफी हद तक पार कर लिया, जिससे अंततः शुरुआती कर्मचारियों और लॉन्ग-टर्म पब्लिक शेयरधारकों दोनों के लिए अपार मूल्य बना। आज भी, स्टेकहोल्डर्स यह ट्रैक करना जारी रखते हैं कि कंपनियां अपने कर्मचारियों को इक्विटी से पुरस्कृत करने और रिटेल व इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के हितों की रक्षा करने के बीच कैसे संतुलन बनाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.