Hinduja Group GC की बड़ी चेतावनी: भारत में आर्बिट्रेशन (Arbitration) अभी भी पीछे, लीगल मार्केट में सुधार जरूरी

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Hinduja Group GC की बड़ी चेतावनी: भारत में आर्बिट्रेशन (Arbitration) अभी भी पीछे, लीगल मार्केट में सुधार जरूरी
Overview

Hinduja Group के जनरल काउंसल (GC), अभिजीत मुखर्जी, का कहना है कि भारत के कॉर्पोरेट लीगल डिपार्टमेंट को अब सिर्फ लागत (Cost Center) की जगह स्ट्रैटेजिक बिजनेस पार्टनर बनना होगा। उन्होंने चेताया है कि भारत का आर्बिट्रेशन (Arbitration) इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी ग्लोबल स्टैंडर्ड्स से काफी पीछे है, भले ही लीगल सर्विसेज मार्केट के उदारीकरण (Liberalization) की वकालत की जा रही हो।

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लीगल डिपार्टमेंट से बढ़कर: स्ट्रैटेजिक पार्टनर की नई भूमिका

किसी भी बड़े ग्रुप जैसे Hinduja Group में, लीगल डिपार्टमेंट को अब सिर्फ एक गेटकीपर (Gatekeeper) के तौर पर देखना पुरानी बात हो गई है। अब लीगल फंक्शन का काम तेजी से जानकारी जुटाना और कंपनी की स्ट्रैटेजी के साथ तालमेल बिठाना है। यह सिर्फ नियम-कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनी के विकास में मदद करने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए लीगल प्रोफेशनल्स को सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित न रहकर, अपनी एक मजबूत पहचान बनानी होगी जो दुनिया भर में मानी जाए।

ग्लोबल नेटवर्क ही असली संपत्ति

कम लीगल टीम के साथ काम करने के लिए अनोखे तरीके अपनाने होंगे। एक मजबूत ग्लोबल नेटवर्क बनाकर, कॉर्पोरेट लीडर्स पारंपरिक सलाह लेने की प्रक्रिया की मुश्किलों से बच सकते हैं। जरूरी जानकारी अक्सर प्रोफेशनल एलायंस और कॉन्फ्रेंस से मिल जाती है, जिससे महंगे थर्ड-पार्टी काउंसल पर निर्भरता कम हो जाती है। यह पीयर-टू-पीयर नॉलेज एक्सचेंज दिखाता है कि मल्टीनेशनल कंपनियां कैसे कानूनी दांव-पेंचों को तेजी से सुलझाने के लिए भरोसेमंद नेटवर्क का इस्तेमाल कर रही हैं।

लीगल मार्केट लिबरलाइजेशन की चुनौतियाँ

भारत में विदेशी लॉ फर्मों के प्रवेश को लेकर चल रही बहस में अभी भी कई तरह की हिचकिचाहट है। हालांकि, यह तर्क दिया जा सकता है कि घरेलू बाजार को बचाने के चक्कर में हम कहीं न कहीं भारतीय टैलेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं। टॉप लॉ स्कूलों से विदेशी फर्मों द्वारा भारी संख्या में हायरिंग यह बताती है कि भारतीय वकील पहले से ही ग्लोबल स्टैंडर्ड्स पर काम कर रहे हैं। एक खुला बाजार प्रोफेशनल प्रैक्टिस को आधुनिक बनाने और लोकल फर्मों को अपनी सर्विस क्वालिटी सुधारने के लिए मजबूर कर सकता है।

आर्बिट्रेशन (Arbitration) में पिछड़ा भारत?

भारत की अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन (Arbitration) का एक बड़ा हब बनने की महत्वाकांक्षाएं हैं, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि इरादों और हकीकत में बड़ा अंतर है। समस्या यह है कि अभी भी लिटिगेशन (Litigation) जैसे प्रोसीजर पर ज्यादा जोर दिया जाता है, जिससे विवाद सुलझाने में देरी होती है। इसके अलावा, स्पेशलाइज्ड इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट की कमी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए एक बड़ी बाधा है, जो सिंगापुर या लंदन जैसे स्थापित हब की एफिशिएंसी के आदी हैं। जब तक संस्थागत स्वतंत्रता की ओर एक बड़ा कदम नहीं उठाया जाता और कोर्ट-केंद्रित प्रक्रियावादी आदतों से दूरी नहीं बनाई जाती, तब तक भारत की आर्बिट्रेशन (Arbitration) क्षमताएं ग्लोबल अल्टरनेटिव बनने के बजाय घरेलू ही रहेंगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.