कश्मीर यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च ने चेताया है कि जम्मू-कश्मीर में ग्लेशियर से जुड़ी झीलें **26%** तक बढ़ गई हैं। यह ट्रेंड हाइड्रोपावर प्लांट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लंबे समय में बड़ा वित्तीय खतरा साबित हो सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ा खतरा
कश्मीर यूनिवर्सिटी के जियोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग के प्रमुख इरफान राशिद के नेतृत्व में हुई रिसर्च बताती है कि 1992 से 2024 के बीच जम्मू-कश्मीर में ग्लेशियल झीलों का दायरा 26% बढ़ा है। यह बदलाव न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि क्षेत्र में मौजूद महत्वपूर्ण एसेट्स के लिए भी बड़ी चुनौती है। झेलम बेसिन में 15 प्रमुख पुल, रिहायशी इलाके और कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स सीधे तौर पर GLOF (Glacial Lake Outburst Floods) के खतरे की चपेट में हैं। निवेशकों और कंपनियों के लिए अब इन प्रोजेक्ट्स की फिजिबिलिटी और फिजिकल सिक्योरिटी पर सवाल उठने लगे हैं।
इंश्योरेंस और इकोनॉमिक असर
इस बढ़ते क्लाइमेट रिस्क का सीधा असर प्रोजेक्ट्स की लागत पर पड़ सकता है। बीमा कंपनियां अब हाई-ऑल्टिट्यूड इंफ्रास्ट्रक्चर का मूल्यांकन करने के लिए सैटेलाइट डेटा का बारीकी से उपयोग कर रही हैं। यदि भविष्य में डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट को प्रोजेक्ट प्लानिंग में नहीं जोड़ा गया, तो इंश्योरेंस प्रीमियम में भारी उछाल और प्रोजेक्ट्स की लागत में बढ़ोतरी तय है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि 'एक्शन न लेने' की लागत 'डेटा-ड्रिवन प्लानिंग' से कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती है।
नई पॉलिसी की जरूरत
यह स्टडी अब एक नीतिगत बदलाव की मांग कर रही है। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे और यूरोपियन स्पेस एजेंसी की सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अब रिस्क-इन्फॉर्म्ड प्लानिंग अनिवार्य है। निवेशकों को सलाह है कि वे हिमालयी इलाकों में किसी भी प्रोजेक्ट में पैसा लगाने से पहले इन क्लाइमेट रिस्क मैप्स को अपनी ड्यू डिलिजेंस का हिस्सा जरूर बनाएं।
