हिमाचल प्रदेश में मानसून का कहर जारी है। हाल ही में एक भयानक भूस्खलन ने 13 लोगों की जान ले ली, जिससे राज्य में बाढ़ और बारिश से होने वाले आर्थिक नुकसान का अंदाजा लग रहा है। राज्य में अभी भी **121** सड़कें बंद हैं, जिससे सप्लाई चेन और खेती-किसानी पर बुरा असर पड़ रहा है।
Detailed Coverage
13 जिंदगियां और अनगिनत समस्याएं
हिमाचल प्रदेश में मानसून की मार लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में काढ़ू नाला के पास हुए भयानक भूस्खलन में 13 लोगों की जान चली गई। यह घटना हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं और उसके आर्थिक बोझ को एक बार फिर सामने लाती है। इस मानसून में अब तक राज्य की 121 सड़कें बंद हो चुकी हैं, जिससे लोगों, ज़रूरी सामानों और सेवाओं का आना-जाना बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
किसानों की बर्बादी और लॉजिस्टिक्स का संकट
सड़कों और पुलों के टूटने से स्थानीय उद्योगों पर सीधा असर पड़ रहा है। लाहुल-स्पीति जिले में किसान अपनी गोभी और मटर जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों को मंडियों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, क्योंकि जाहलमा नाले पर बना पुल बह गया है। इस लॉजिस्टिक्स की समस्या के चलते किसानों को अपनी फसल फेंकनी पड़ रही है, जिससे उन्हें भारी नुकसान हो रहा है। पिछले साल से पुल का यह बार-बार टूटना पहाड़ी इलाकों में कनेक्टिविटी बनाए रखने की चुनौती को दिखाता है, जहाँ वैकल्पिक रास्ते या तो हैं ही नहीं या फिर दुर्गम हैं।
बढ़ता आर्थिक बोझ
आपदा प्रबंधन के आंकड़ों के मुताबिक, इस मानसून में ही 19 बड़े भूस्खलन, 11 अचानक आई बाढ़ और 6 क्लाउडबर्स्ट की घटनाएं सामने आई हैं। साल 2022 से 2025 के बीच हिमाचल प्रदेश में बाढ़-बारिश से कुल आर्थिक नुकसान ₹20,000 करोड़ के पार जा चुका है। यह बढ़ता हुआ खर्च राज्य के खजाने पर भारी दबाव डाल रहा है, क्योंकि आपातकालीन राहत और छोटी-मोटी मरम्मत के लिए फंड को लगातार डायवर्ट करना पड़ रहा है, जिससे भविष्य की बड़ी और मज़बूत परियोजनाओं के लिए पैसा कम पड़ रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर मंडराता खतरा
निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता क्षेत्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर की चरम मौसम के प्रति संवेदनशीलता है। सड़कों और पुलों का बार-बार क्षतिग्रस्त होना यह बताता है कि हिमालय में निर्माण के पारंपरिक तरीकों को बदलकर अधिक मज़बूत और मौसम-प्रतिरोधी इंजीनियरिंग मानकों की ज़रूरत है। राज्य में मौतों का आंकड़ा 2022 में 276 से बढ़कर 2025 में 468 हो गया है, ऐसे में अब आपदा जोखिम प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग पर ध्यान केंद्रित होने की उम्मीद है। इस क्षेत्र पर नज़र रखने वाले निवेशकों को राज्य सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में विकास नियमों से जुड़े किसी भी नीतिगत बदलाव पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये यहां परियोजनाओं की दीर्घकालिक व्यवहार्यता को प्रभावित करेंगे।
