हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम और नूंह में बिजली वितरण के निजीकरण (Privatization) के फैसले को वापस ले लिया है। तीन दिन तक चली कर्मचारियों की हड़ताल के बाद सरकार के इस यू-टर्न से औद्योगिक गतिविधियों में आई रुकावट खत्म हो गई है, लेकिन यह राज्य में सुधारों की राह में बड़ी चुनौती को दर्शाता है।
हड़ताल और सरकारी यू-टर्न
गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे औद्योगिक हब में बिजली वितरण के निजीकरण के खिलाफ बिजली कर्मचारियों ने 3 दिन तक काम बंद रखा था। इसका असर इतना गहरा था कि कई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स ठप हो गईं और भारी आर्थिक नुकसान की खबरें सामने आईं। तनाव बढ़ने के बाद, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और ऊर्जा मंत्री अनिल विज के साथ हुई बातचीत में सरकार ने निजीकरण की योजना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालने का निर्णय लिया है। इसके बाद कर्मचारी अपने काम पर लौट आए हैं और बिजली व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर आ रही है।
औद्योगिक और आर्थिक असर
कादीपुर और बसई जैसे क्षेत्रों में बिजली कटने के कारण प्रोडक्शन पर बुरा असर पड़ा। ट्रेड बॉडीज ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर पावर सप्लाई लंबे समय तक बाधित रही, तो सप्लाई चेन के साथ-साथ पानी की आपूर्ति जैसी बुनियादी सेवाएं भी प्रभावित होंगी। अब संकट टलने से उद्योगों ने राहत की सांस ली है, क्योंकि उन्हें अपने महंगे बैकअप पावर स्रोतों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
पावर सेक्टर में रिफॉर्म की राह में रोड़ा
सरकार का यह निजीकरण का प्रस्ताव राज्य की बिजली कंपनियों (DISCOMs) के AT&C घाटे को कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए था। लेकिन, यूनियन के कड़े विरोध ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के सुधारों को लागू करना कितना चुनौतीपूर्ण है। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि Dakshin Haryana Bijli Vitran Nigam और Uttar Haryana Bijli Vitran Nigam जैसी सरकारी कंपनियां अभी भी पारंपरिक ढांचे के तहत ही काम करती रहेंगी। निजी कंपनियों के लिए वितरण क्षेत्र में मौके अभी सीमित बने हुए हैं और भविष्य के सुधारों को लेकर अब एक सतर्क नजरिया अपनाना होगा।
