भारत सरकार स्टील इंडस्ट्री को 'ग्रीन' बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। अगले तीन महीनों के अंदर **₹5,000 करोड़** की एक नई स्कीम लॉन्च की जाएगी, जिसका मकसद छोटे और मझोले स्टील उत्पादकों को क्लीन टेक्नोलॉजी अपनाने और उत्सर्जन कम करने में मदद करना है।
नई स्कीम: 'नेशनल स्ट्रेटेजी फॉर सस्टेनेबल सेकेंडरी स्टील'
सरकार जल्द ही ₹5,000 करोड़ के बजट वाली इस स्कीम को कैबिनेट की मंजूरी के लिए पेश करेगी। इसका मुख्य उद्देश्य स्टील सेक्टर से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना है, क्योंकि यह सेक्टर देश के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ा योगदान देता है। यह स्कीम खासकर सेकेंडरी स्टील उत्पादकों की प्रोडक्शन प्रोसेस को अपग्रेड करने पर फोकस करेगी।
प्राइमरी बनाम सेकेंडरी स्टील उत्पादक
भारतीय स्टील इंडस्ट्री में दो तरह के उत्पादक होते हैं: प्राइमरी और सेकेंडरी। बड़े इंटीग्रेटेड प्लांट्स (प्राइमरी) आयरन ओर से सीधे स्टील बनाते हैं। वहीं, सेकेंडरी उत्पादक स्क्रैप या स्पंज आयरन का इस्तेमाल करके इलेक्ट्रिक फर्नेस या रोलिंग मिल्स के ज़रिए स्टील बनाते हैं। ये अक्सर छोटे पैमाने पर काम करते हैं और इनकी प्रोडक्शन एफिशिएंसी और पॉल्यूशन लेवल बड़े प्लांट्स के मुकाबले ज़्यादा होता है। सरकार की यह नई स्कीम इन छोटे उत्पादकों को मॉडर्न टेक्नोलॉजी और उत्सर्जन मानकों में अंतर को पाटने में मदद करेगी।
क्यों ज़रूरी हैं एमिशन स्टैंडर्ड्स?
फिलहाल, भारतीय स्टील इंडस्ट्री का एमिशन इंटेंसिटी 2.55 टन CO2 प्रति टन क्रूड स्टील है, जो ग्लोबल एवरेज 1.9 टन से ज़्यादा है। इस स्कीम के ज़रिए सरकार वित्तीय सहायता देकर कंपनियों को पुरानी टेक्नोलॉजी को बदलने के लिए प्रोत्साहित करेगी। उम्मीद है कि नई मशीनरी से न सिर्फ पॉल्यूशन कम होगा, बल्कि फ्यूल और बिजली की एफिशिएंसी भी बढ़ेगी, जिससे लागत कम होगी।
निवेश और ट्रांजीशन का रिस्क
हालांकि, स्कीम में फंड का प्रावधान है, लेकिन निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि नई, क्लीन टेक्नोलॉजी अपनाने में सरकारी सब्सिडी के अलावा भी बड़ा कैपिटल खर्च आ सकता है। कंपनियों को इन अपग्रेड्स को अपने डेट लेवल और शॉर्ट-टर्म प्रॉफिट मार्जिन पर ज़्यादा दबाव डाले बिना मैनेज करना होगा। अगर नई टेक्नोलॉजी लगाने का खर्च सब्सिडी से ज़्यादा हुआ या इंप्लीमेंटेशन में उम्मीद से ज़्यादा देर हुई, तो छोटे उत्पादकों पर वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
स्कीम लॉन्च होने के बाद, निवेशकों को इसके आधिकारिक दिशा-निर्देशों पर नज़र रखनी चाहिए। इसमें एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया, सब्सिडी के लिए आवेदन की प्रक्रिया और टेक्नोलॉजी की ज़रूरतें जैसी बातें शामिल होंगी। सेकेंडरी स्टील उत्पादकों से मैनेजमेंट कमेंट्री पर भी ध्यान देना ज़रूरी होगा कि वे इन इंसेंटिव्स का फायदा उठाने की क्या योजना बना रहे हैं और बाकी खर्च कैसे उठाएंगे। नई टेक्नोलॉजी को प्रोडक्शन में कैसे इंटीग्रेट किया जाता है, यह प्रॉफिट मार्जिन और प्रोडक्शन कैपेसिटी पर असर डालेगा।
