केंद्र सरकार ने 1957 के Mines and Minerals Act को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इस रिफॉर्म का मकसद माइनिंग सेक्टर के कामकाज को आसान बनाना और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई को सुरक्षित करना है।
भारत के माइनिंग सेक्टर में एक बड़ा विधायी बदलाव आने वाला है। माइन्स मिनिस्ट्री (Ministry of Mines) ने लगभग सात दशकों से चले आ रहे Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 को बदलने की पहल शुरू कर दी है। इसके लिए एक इंटर-मिनिस्टीरियल कमेटी का गठन किया गया है, जो इस पूरे सेक्टर को आधुनिक बनाने के लिए नया फ्रेमवर्क तैयार करेगी।
क्यों हो रहा है यह बदलाव?
देश का लक्ष्य 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनना है, और इस सपने को पूरा करने के लिए माइनिंग सेक्टर का योगदान बेहद जरूरी है। फिलहाल, भारत अपनी एनर्जी ट्रांजिशन पर फोकस कर रहा है, जिसके लिए लिथियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की जरूरत है। नए कानून के जरिए सरकार एक ऐसा फ्लेक्सिबल सिस्टम बनाना चाहती है जो ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक हो और नई टेक्नोलॉजी के साथ तालमेल बिठा सके।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
माइनिंग और स्टील कंपनियों के लिए अभी कई कानूनी प्रक्रियाएं जटिल हैं। हालांकि 2015 और 2021 में हुए संशोधनों ने नीलामी (Auction) सिस्टम को पारदर्शी बनाया था, लेकिन अब सरकार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' पर अधिक जोर दे रही है।
सबसे बड़ी चुनौती केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के संतुलन की है। अभी भी रेवेन्यू शेयरिंग और रॉयल्टी स्ट्रक्चर को लेकर अक्सर विवाद होता है। आने वाले समय में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया कानून ऑपरेशनल अप्रूवल और एनवायरमेंटल क्लीयरेंस को लेकर कितनी स्पष्टता लाता है। यह रिफॉर्म कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट और प्रोजेक्ट की टाइमलाइन पर सीधा असर डालेगा, इसलिए निवेशकों को ड्राफ्ट बिल की हर अपडेट पर नजर रखनी चाहिए।
