हाल ही में लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) इंजीनियर के एक पोस्ट ने तहलका मचा दिया है। इस पोस्ट में उन्होंने गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) में अपने पुराने अनुभव को साझा किया है, जिसने सैलरी को लेकर चल रही बहस को हवा दे दी है। यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि कंपनियां 'डिग्री' या 'कॉलेज' के आधार पर सैलरी तय करती हैं या फिर 'प्रदर्शन' के आधार पर।
क्या हुआ था?
माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर कृति रोहिला ने गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के बेंगलुरु (Bengaluru) ऑफिस में अपने अनुभव के बारे में बताया। लिंक्डइन (LinkedIn) पर पोस्ट की गई इस कहानी में उन्होंने अपने पूर्व मैनेजर के साथ सैलरी को लेकर हुई एक बातचीत का जिक्र किया।
कृति ने बताया कि जब वह गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) में थीं, तो उनकी सैलरी इसलिए कम रखी गई थी क्योंकि उन्होंने एक टियर-3 कॉलेज से पढ़ाई की थी। जबकि, आईआईटी (IIT) जैसे टॉप कॉलेजों से आए उनके सहकर्मी, जो बिल्कुल वैसा ही काम करते थे, उन्हें कहीं ज्यादा सैलरी मिल रही थी। रोहिला के मुताबिक, उनकी शुरुआती सैलरी उनके कॉलेज की डिग्री के आधार पर तय हुई थी।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह कॉर्पोरेट जगत में एक आम बात है। लेकिन इस स्थिति के कारण उन्होंने नई नौकरी की तलाश शुरू की और अंततः माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) में चली गईं। कृति ने बताया कि जब उन्होंने नौकरी छोड़ी, तो गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने उनकी नई नौकरी के ऑफर के बराबर सैलरी देने की पेशकश की। उन्होंने इस अनुभव को कॉर्पोरेट नेगोशिएशन (negotiation) की रणनीति में एक बदलाव बताया।
'डिग्री' या 'प्रदर्शन': किस पर टिकी है सैलरी?
कृति के इस पोस्ट के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सैलरी सिर्फ कॉलेज की डिग्री के आधार पर तय होनी चाहिए या फिर कर्मचारी के काम और प्रदर्शन के आधार पर। कई बड़ी कंपनियां हायरिंग के समय उम्मीदवार के कॉलेज को सैलरी बैंड तय करने का आधार मानती हैं। उनका तर्क होता है कि इससे शुरुआती दौर में सही उम्मीदवार चुनने में मदद मिलती है।
हालांकि, कर्मचारियों का कहना है कि जब काम का बोझ और जिम्मेदारी बराबर हो, तो सिर्फ डिग्री के आधार पर सैलरी में अंतर करना गलत है। इससे लंबे समय तक वेतन में असमानता बनी रहती है।
टैलेंट मैनेजमेंट के लिए यह क्यों मायने रखता है?
यह मामला टैलेंट मैनेजमेंट (Talent Management) के नजरिए से भी काफी अहम है। जब हाई-परफॉर्मिंग (high-performing) कर्मचारी यह महसूस करते हैं कि उन्हें उनके काम के हिसाब से पैसे नहीं मिल रहे, तो वे नौकरी छोड़ देते हैं। इससे कंपनी को न सिर्फ अच्छा टैलेंट खोना पड़ता है, बल्कि नई भर्ती, ट्रेनिंग और जानकारियों के नुकसान का भी भारी खर्च उठाना पड़ता है।
सही ह्यूमन कैपिटल मैनेजमेंट (human capital management) के लिए यह जरूरी है कि सैलरी कर्मचारियों के वर्तमान प्रदर्शन और योगदान से मेल खाए। अगर सैलरी स्ट्रक्चर (structure) कड़ा या अनुचित लगता है, तो इससे कर्मचारियों का मनोबल गिर सकता है। यह घटना कंपनियों के लिए एक रिमाइंडर है कि उन्हें समय-समय पर अपने सैलरी बेंचमार्क (benchmark) की समीक्षा करनी चाहिए, न कि केवल हायरिंग के समय के मेट्रिक्स (metrics) पर निर्भर रहना चाहिए।
नेगोशिएशन (Negotiation) की असली ताकत
कृति के अनुभव ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि कॉर्पोरेट करियर में नेगोशिएशन (negotiation) की ताकत कितनी अहम होती है। उन्होंने खुद माना कि जब तक उनके पास दूसरी नौकरी का ऑफर नहीं था, तब तक वह अपनी सैलरी बढ़वाने के लिए मोलभाव नहीं कर पाईं। उनका निष्कर्ष यह है कि अक्सर कॉर्पोरेट में सैलरी की बातचीत कर्मचारी के पास मौजूद 'बारगेनिंग पावर' (bargaining power) पर निर्भर करती है। बहुत से कर्मचारियों को यह अनुभव होता है कि अंदरूनी सैलरी रिव्यू (review) में बदलाव के लिए बाहरी ऑफर (external offer) जैसी किसी चीज की जरूरत पड़ती है।
कर्मचारियों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
यह चर्चा इस बात पर जोर देती है कि टैलेंट अब सैलरी ट्रांसपेरेंसी (transparency) को कैसे देखता है। जैसे-जैसे ज्यादा प्रोफेशनल अपने अनुभव साझा करेंगे, कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा कि वे अपनी इंटरनल पे इक्विटी (pay equity) नीतियों को पारदर्शी और उचित बनाएं। कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि उन्हें अपने मार्केट वैल्यू (market value) का लगातार आकलन करते रहना चाहिए और प्रोफेशनल मोबिलिटी (mobility) बनाए रखनी चाहिए। कंपनियों के लिए यह देखना होगा कि सैलरी और कल्चर से जुड़े ये मुद्दे उनके लॉन्ग-टर्म रिटेंशन (retention) और 'एम्प्लॉयर ऑफ चॉइस' (employer of choice) की रेपुटेशन (reputation) को कैसे प्रभावित करते हैं।
