Golden Temple Frescoes: सिख कला की लुप्त होती विरासत को बचाने की जद्दोजहद

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Golden Temple Frescoes: सिख कला की लुप्त होती विरासत को बचाने की जद्दोजहद

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) में सदियों पुरानी मोहराकाशी भित्तिचित्र (frescoes) सिख कला की एक नाजुक और अमूल्य धरोहर हैं। लेकिन, ये कलाकृतियाँ पर्यावरण के क्षरण और व्यापक आधुनिकीकरण के प्रयासों से लगातार खतरे में हैं।

मोहराकाशी: एक लुप्त होती कला

श्री हरिमंदिर साहिब, यानी गोल्डन टेम्पल में बनी ये भित्तिचित्र सिख कला की सदियों पुरानी परंपरा का एक महत्वपूर्ण, लेकिन बेहद नाज़ुक हिस्सा हैं। इन कलाकृतियों में फूलों की बारीक डिज़ाइन, पक्षी और ऐतिहासिक कहानियाँ उकेरी गई हैं। इन्हें 'मोहराकाशी' तकनीक से बनाया गया है, जिसमें गीली चूने की प्लास्टर पर प्राकृतिक खनिज रंगों का लेप लगाया जाता है। यह प्रक्रिया ऐसी है कि रंग दीवार का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे ये कलाकृतियाँ लंबे समय तक चलती हैं, लेकिन फिर भी इन्हें भौतिक क्षति और पर्यावरण के प्रभाव से खतरा बना रहता है।

विरासत और आधुनिकीकरण का टकराव

इतिहासकारों और समुदाय के लिए, ये पेंटिंग्स सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि उस समय की सिख कलात्मक पहचान से सीधा जुड़ाव हैं, जो 1947 के विभाजन (Partition) में बुरी तरह प्रभावित हुई थी। उस दौर की कहानियों के मुताबिक, पश्चिमी पंजाब के कई गुरुद्वारों में ऐसी ही जीवंत कलाकृतियाँ थीं, जो विस्थापन के कारण खो गईं। इसलिए, अमृतसर में बची हुई ये कलाकृतियाँ बीते युग की दृश्य भाषा को दर्शाने वाली अनमोल सांस्कृतिक धरोहर मानी जाती हैं।

हालांकि, इन भित्तिचित्रों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। दशकों से, अमृतसर सहित कई ऐतिहासिक गुरुद्वारों में बड़े पैमाने पर नवीनीकरण (renovations) हुए हैं। 'कर सेवा' (स्वैच्छिक सेवा) के तहत होने वाले इन प्रोजेक्ट्स में अक्सर धार्मिक स्थलों के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रक्रिया में, कई बार मूल ऐतिहासिक परतों को संगमरमर या टाइल्स जैसी आधुनिक सामग्री से ढक दिया जाता है या बदल दिया जाता है। 1980 के दशक के मध्य की घटनाओं के बाद अकाली तख्त (Akal Takht) के पुनर्निर्माण के दौरान भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भित्तिचित्रों के स्थायी रूप से खो जाने का जिक्र मिलता है।

संरक्षण की राह

पेशेवर संरक्षणवादी (conservationists) इन बची हुई पेंटिंग्स को बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाने की वकालत कर रहे हैं। बहस इस बात पर केंद्रित है कि एक सक्रिय और अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले धार्मिक स्थल की ज़रूरतों और विरासत संरक्षण की आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इन भित्तिचित्रों का मूल्य किसी औद्योगिक संपत्ति की तरह आर्थिक रूप से नहीं आँका जा सकता; ये अपूरणीय सांस्कृतिक प्रतीक हैं। सभी हितधारकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी मानक, दीर्घकालिक नीति खोजना है जो इन कलाकृतियों की भौतिक अखंडता सुनिश्चित करे और साथ ही मंदिर की धार्मिक परंपराओं का भी सम्मान करे। विरासत संरक्षण में रुचि रखने वाले निवेशकों और आम जनता के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य की नवीनीकरण योजनाओं में इस अनूठी कलात्मक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए उन्नत संरक्षण मानकों को कैसे शामिल किया जाता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.