6 फरवरी 2026 को, कीमती धातु सोने में थोड़ी नरमी देखने को मिली। 24 कैरेट गोल्ड फ्यूचर्स में गिरावट का एक बड़ा कारण CME ग्रुप का गोल्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर मार्जिन की आवश्यकता को 8% से बढ़ाकर 9% करना रहा। यह तकनीकी कदम बाज़ार में अत्यधिक सट्टेबाजी (speculative excess) को नियंत्रित करने के लिए है और अक्सर यह कीमतों में तेज गिरावट को बढ़ावा दे सकता है। इसी के साथ, टेक्नोलॉजी शेयरों में बिकवाली के बीच अमेरिकी डॉलर में आई मजबूती की खबरों ने भी सोने को गैर-डॉलर धारकों के लिए महंगा बना दिया, जिससे इसकी तत्काल मांग प्रभावित हुई। इस बीच, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) अपने दो हफ्ते के ऊपरी स्तर के करीब कारोबार कर रहा था, जो मिश्रित बाजार सेंटीमेंट को दर्शा रहा था।
हालांकि, अल्पावधि के ये कारक बाजार की चाल को प्रभावित कर रहे थे, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य सोने को एक 'सेफ-हेवन' यानी सुरक्षित निवेश के तौर पर मजबूत बनाए हुए है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत जैसे कुछ तनाव कम होने के संकेत मिले थे, जिसने सोने की पारंपरिक भूमिका को अस्थायी रूप से कम किया। लेकिन, ऐतिहासिक रूप से व्यापार विवादों और क्षेत्रीय तनावों जैसी भू-राजनीतिक अस्थिरता सोने की मांग को बढ़ाती रही है। BRICS देशों के सेंट्रल बैंक भी डॉलर-आधारित संपत्तियों के विकल्प के तौर पर अपने सोने के भंडार बढ़ा रहे हैं, जो प्रतिबंधों और वैश्विक करेंसी स्थिरता को लेकर उनकी चिंताओं को दर्शाता है।
घरेलू बाजार में, भारतीय सर्राफा खरीदारों को अभी भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। 6 फरवरी 2026 को, भारत में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत ₹151,770 प्रति 10 ग्राम थी, जो दुबई के ₹143,483 के मुकाबले ₹8,287 यानी 5.78% अधिक है। यह बड़ा अंतर मुख्य रूप से भारत के आयात शुल्क (import duties), स्थानीय टैक्स और बाजार की अपनी गतिशीलता के कारण है, जिससे देश में सोने की खरीदारी अंतरराष्ट्रीय हब की तुलना में अधिक महंगी पड़ती है।
सोने के लिए एक बड़ा और महत्वपूर्ण सपोर्ट फैक्टर अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) द्वारा आगामी महीनों में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें हैं। जनवरी 2026 की अपनी मीटिंग में फेड ने अपनी प्रमुख ब्याज दर को 3.5%–3.75% की टारगेट रेंज में अपरिवर्तित रखा, जो बाजार की उम्मीदों के अनुरूप था। भले ही नीति निर्माताओं की दर कटौती की गति को लेकर राय बंटी हुई है, लेकिन बाजार 2026 में दर में कटौती की उम्मीद कर रहा है। इसका मुख्य कारण लेबर मार्केट का स्थिर होना और महंगाई का थोड़ा ऊपर बने रहना है। चूंकि सोना एक ऐसी परिसंपत्ति है जिस पर कोई ब्याज नहीं मिलता, यह आमतौर पर कम ब्याज दरों वाले माहौल में अच्छा प्रदर्शन करता है, जो सोने की कीमतों को एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
जहां एक ओर सोने की कीमतों में स्थिरता दिख रही है, वहीं चांदी (Silver) और उससे जुड़े ETFs में काफी बड़ी गिरावट देखी गई। 5 फरवरी 2026 को, सिल्वर ETFs में 12% से लेकर 21% तक की भारी गिरावट आई, जो गोल्ड ETFs में आई लगभग 5.5% की गिरावट से कहीं ज्यादा थी। यह अंतर दर्शाता है कि चांदी, अपनी औद्योगिक कमोडिटी (industrial commodity) और सेफ-हेवन, दोनों भूमिकाओं के कारण, सोने की तुलना में अधिक अस्थिर (volatile) है। अल्पावधि में कीमतों में आई इस गिरावट के बावजूद, जनवरी 2026 में ग्लोबल फिजिकली-बैक्ड गोल्ड ETFs में बड़ी मात्रा में इनफ्लो (inflows) देखा गया। इससे वे अपने रिकॉर्ड असेट्स अंडर मैनेजमेंट (assets under management) और कुल होल्डिंग्स तक पहुंच गए, जो संस्थानों की सोने में लगातार और मजबूत रुचि को दर्शाता है।