भारतीय शेयर बाज़ार पर ग्लोबल फंड्स का बढ़ता संशय: जानें क्या हैं वजहें

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
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बड़े इमर्जिंग मार्केट फंड्स में से ज्यादातर के पास मौजूदा बेंचमार्क के मुकाबले कम भारतीय शेयर हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं - ऊंचे वैल्यूएशन और कमाई में धीमी रफ्तार। जहाँ भारतीय निवेशक अभी भी उत्साहित हैं, वहीं विदेशी फंड मैनेजरों को भारत के शेयरों के ऊंचे दाम दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले चिंताजनक लग रहे हैं। आइए जानते हैं कि क्यों विदेशी निवेशकों का रुझान कम हो रहा है और इसका बाजार की लिक्विडिटी पर क्या असर पड़ सकता है।

क्या हुआ है?

लगभग $320 बिलियन की रकम मैनेज करने वाले 70 बड़े इमर्जिंग मार्केट फंड्स के हालिया विश्लेषण से पता चलता है कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से दूरी बना रहे हैं। मार्च 2026 तक, इन ग्लोबल फंड्स में से 61% ने भारत में 'अंडरवेट' पोजीशन (यानी, अपने इंडेक्स के मुकाबले कम हिस्सेदारी) बनाए रखी। इसका मतलब है कि विदेशी फंड मैनेजरों को भारतीय बाजार की मौजूदा संभावनाओं को लेकर दूसरे क्षेत्रों की तुलना में उतनी उम्मीद नहीं है, और वे यहां निवेश बढ़ाने में सावधानी बरत रहे हैं।

वैल्यूएशन का भारी प्रीमियम

इस सतर्क रुख का एक बड़ा कारण भारतीय शेयरों की कीमतें हैं। मौजूदा समय में, भारतीय बाजार अपने इमर्जिंग मार्केट साथियों की तुलना में लगभग 70% के वैल्यूएशन प्रीमियम पर कारोबार कर रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो, निवेशक भारत में प्रति रुपये की कमाई के लिए दूसरे उभरते देशों की तुलना में काफी ज्यादा भुगतान कर रहे हैं। कई ग्लोबल फंड मैनेजरों के लिए, यह अंतर जायज ठहराना मुश्किल हो गया है, खासकर जब भारतीय कंपनियों की कमाई की ग्रोथ, शेयरों में बनी उम्मीदों के मुकाबले पिछड़ रही है।

कमाई में ग्रोथ की चिंता

विदेशी निवेशक अक्सर ग्रोथ और कीमत के बीच संतुलन चाहते हैं। हालांकि आने वाले फाइनेंशियल ईयर में भारतीय कॉर्पोरेट आय में सुधार की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल यह क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ रही है। कमाई के इन अनुमानों पर कई कारक दबाव बना रहे हैं। कमजोर रुपया, जो आयात को महंगा बनाता है, और ऊंचे तेल की कीमतें, कई कंपनियों के लिए लागत बढ़ा रही हैं। इसके अलावा, मॉनसून पैटर्न से संभावित व्यवधान, विशेष रूप से एल नीनो (El Niño) की चिंताएं, जिन पर बारीकी से नजर रखी जा रही है, क्योंकि वे ग्रामीण मांग और व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

घरेलू सेंटीमेंट क्यों है अलग?

विदेशी और घरेलू सेंटीमेंट के बीच एक स्पष्ट अंतर है। जहां ग्लोबल फंड्स ने अपनी हिस्सेदारी कम की है, वहीं भारतीय बाजार को डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) और रिटेल प्रतिभागियों का मजबूत समर्थन मिला है। इस आंतरिक खरीददारी ने विदेशी सतर्कता के बावजूद बाजार को मजबूती दी है। सिटी रिसर्च (Citi Research) ने बताया है कि ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट फंड्स में भारत की हिस्सेदारी पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों ने भारत की वर्तमान ग्लोबल AI इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्डआउट में सीमित भूमिका को भी एक संभावित कारण बताया है, जिससे अन्य टेक-केंद्रित उभरते बाजारों की तुलना में उनका उत्साह कम हुआ है।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

निवेशकों के लिए, मुख्य बात यह है कि क्या भारतीय कंपनियां अपनी मौजूदा वैल्यूएशन के अनुरूप कमाई की ग्रोथ दे पाएंगी। यदि कमाई में तेजी आती है, तो ग्लोबल निवेशकों के लिए वैल्यूएशन प्रीमियम स्वीकार करना आसान हो सकता है, जिससे विदेशी इनफ्लो (Foreign Inflows) वापस आ सकते हैं। निवेशकों को उल्लिखित मैक्रोइकॉनॉमिक कारकों पर भी नजर रखनी चाहिए, जैसे कि करेंसी की स्थिरता, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कृषि उत्पादन, क्योंकि ये कॉर्पोरेट मार्जिन को काफी प्रभावित करेंगे। निकट भविष्य में बाजार की दिशा तय करने में घरेलू खरीददारी की ताकत और विदेशी फंड सेंटीमेंट के बीच का संतुलन महत्वपूर्ण होगा।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.