Naukri की नई रिपोर्ट के अनुसार, Gen Z प्रोफेशनल अब सैलरी से ज्यादा स्किल डेवलपमेंट और वर्क-लाइफ बैलेंस को अहमियत दे रहे हैं। निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि कंपनियों को अपनी HR स्ट्रैटेजी बदलनी पड़ सकती है, और ट्रेनिंग व एम्प्लॉई रिटेंशन पर ज़्यादा खर्च करना पड़ सकता है।
क्या हुआ है?
Naukri की जून 2026 की "The Gen Z Work Code" रिपोर्ट भारत की युवा प्रोफेशनल जनरेशन की वर्कप्लेस प्रायोरिटीज में एक बड़े बदलाव को उजागर करती है। 23,000 से ज़्यादा कर्मचारियों पर हुए इस सर्वे में पाया गया कि अब सैलरी जॉब सैटिस्फैक्शन का मुख्य कारण नहीं रही। 57% जवाब देने वालों ने नए स्किल्स सीखने को करियर ग्रोथ माना, जबकि सिर्फ 21% ने ज़्यादा सैलरी को प्राथमिकता दी। इसके अलावा, वर्क-लाइफ बैलेंस नौकरी चुनने का सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरा है, जिसमें 80% लोगों ने कैश बोनस या पब्लिक रिकग्निशन से ज़्यादा लर्निंग और डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को चुना।
टैलेंट रिटेंशन का बढ़ता खर्च
यह डेटा कंपनियों के लिए एक बड़ा संकेत है कि उन्हें अपने सबसे बड़े खर्च - एम्प्लॉई कॉस्ट - को कैसे मैनेज करना है। पहले कंपनियां टॉप टैलेंट को रोकने के लिए सैलरी में भारी बढ़ोतरी करती थीं। लेकिन अब अगर वर्कफोर्स फ्लेक्सिबल शेड्यूल और स्ट्रक्चर्ड लर्निंग को सैलरी हाइक से ज़्यादा अहमियत दे रही है, तो कंपनियों को अपना खर्च री-एलोकेट करना होगा। इसका मतलब यह नहीं कि खर्च कम होगा, बल्कि कैपिटल को लर्निंग एंड डेवलपमेंट (L&D) प्लेटफॉर्म्स, फ्लेक्सिबल ऑफिस इंफ्रास्ट्रक्चर और मेंटल वेलनेस इनिशिएटिव्स की तरफ मोड़ना होगा। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या ये इनवेस्टमेंट्स बेहतर प्रोडक्टिविटी लाते हैं या सिर्फ मार्जिन को प्रभावित किए बिना फिक्स्ड कॉस्ट बढ़ाते हैं।
हायर टर्नओवर का खतरा
रिपोर्ट टैलेंट टर्नओवर से जुड़े ऑपरेशनल रिस्क में बढ़ोतरी का संकेत देती है। Gen Z के करीब 14% प्रोफेशनल ने कहा कि वे एक साल के अंदर नौकरी छोड़ देंगे अगर उन्हें ग्रोथ के सीमित अवसर दिखे, जबकि Millennials में यह आंकड़ा सिर्फ 3% था। हाई टर्नओवर रिक्रूटमेंट और ट्रेनिंग के लगातार बढ़ते खर्च का चक्र बनाता है। जिन सेक्टर्स में युवा टैलेंट पर ज़्यादा निर्भरता है - जैसे IT सर्विसेज, स्टार्ट-अप्स और कंज्यूमर टेक - वहां यह ट्रेंड ऑपरेटिंग एक्सपेंस बढ़ा सकता है और प्रोजेक्ट्स में देरी कर सकता है, अगर अनुभवी स्टाफ को लगातार नए, अप्रशिक्षित लोगों से बदला जाए।
मार्जिन और एफिशिएंसी का सवाल
हालांकि स्किल-बिल्डिंग की डिमांड से कंपनियों को शॉर्ट-टर्म में वेज इन्फ्लेशन को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है, लेकिन यह HR डिपार्टमेंट्स की एफिशिएंसी पर दबाव डालता है। जो कंपनियां करियर प्रोग्रेशन पाथ और ट्रांसपेरेंट कम्युनिकेशन देने में नाकाम रहती हैं, वे स्टाफ खोने का जोखिम उठाती हैं। यह सिर्फ HR की चुनौती नहीं, बल्कि एक फाइनेंशियल मुद्दा भी है। हाई एट्रिशन रेट सीधे तौर पर हायरिंग कॉस्ट बढ़ाकर और कर्मचारियों की फुल प्रोडक्टिविटी तक पहुंचने की स्पीड धीमी करके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करता है।
आगे क्या देखना है?
निवेशक कंपनी की फाइनेंशियल रिपोर्ट्स में "Employee Benefit Expenses" और "Attrition Rates" या "Talent Retention Strategy" पर मैनेजमेंट की कमेंट्री पर ध्यान दे सकते हैं। Gen Z पर हाई डिपेंडेंसी वाली फर्मों में शेयरहोल्डर्स के लिए मुख्य मॉनिटरेबल पॉइंट्स ये हैं:
- एट्रिशन डेटा: क्या कंपनियां अपनी लेटेस्ट क्वार्टरली फाइलिंग में हायर टर्नओवर रेट देख रही हैं?
- L&D स्पेंडिंग: क्या ट्रेनिंग और अपस्किलिंग प्रोग्राम्स पर खर्च में कोई खास बढ़ोतरी हुई है?
- मैनेजमेंट कमेंट्री: क्या लीडरशिप ऑपरेशनल एफिशिएंसी बनाए रखने के तरीके के रूप में वर्कप्लेस फ्लेक्सिबिलिटी और करियर पाथ ट्रांसपेरेंसी पर चर्चा कर रही है?
- प्रोडक्टिविटी मेट्रिक्स: क्या स्किल डेवलपमेंट पर फोकस से प्रति कर्मचारी आउटपुट में सुधार हो रहा है, या यह सिर्फ एक कॉस्ट सेंटर बन गया है?
