सरकारी खरीद का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म GeM (Government e-Marketplace) ने अपने संचालन के 10 साल पूरे कर लिए हैं। इस मौके पर, प्लेटफॉर्म ने **₹1.55 लाख करोड़** से ज़्यादा के सालाना ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू (GMV) का आंकड़ा पार कर लिया है।
सरकारी खरीद का डिजिटल क्रांति
GeM, भारत का सरकारी खरीद पोर्टल, अब एक दशक पूरा कर चुका है और इस दौरान इसने खरीद-बिक्री के तरीके में क्रांति ला दी है। अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, प्लेटफॉर्म का सालाना GMV ₹1.55 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। यह इसके पहले साल के ₹422 करोड़ के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग है, जो सरकारी खरीद प्रक्रियाओं के तेजी से डिजिटलीकरण को दर्शाता है।
₹20 लाख करोड़ का कुल कारोबार
शुरुआत से अब तक, GeM ने ₹20 लाख करोड़ से ज़्यादा के कुल लेनदेन को संभाला है। यह पोर्टल सरकारी खरीदारों को विक्रेताओं के एक बड़े नेटवर्क से जोड़ता है, जिसमें 12.28 लाख से ज़्यादा माइक्रो और छोटे उद्यम (MSEs) और 42,000 से अधिक स्टार्टअप शामिल हैं। इस डिजिटल बदलाव का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और सरकारी खरीद में बेहतर मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करना है।
MSEs के लिए 'वोकॅल फॉर लोकल'
खासकर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के व्यवसायों के लिए, GeM सरकारी कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने का एक प्रमुख जरिया बन गया है। आंकड़ों से पता चलता है कि MSEs ने ₹9 लाख करोड़ से ज़्यादा के ऑर्डर पूरे किए हैं, जो प्लेटफॉर्म के कुल लेनदेन का लगभग 45.6% है। यह दर्शाता है कि सरकार की 'मेक इन इंडिया' और 'वोकॅल फॉर लोकल' पहलों का छोटे और स्थानीय विक्रेताओं को बढ़ावा देने में अहम योगदान है।
'GeM Sahay' से छोटे कारोबारियों को मिलेगी राहत
GeM ने 'GeM Sahay' जैसी वित्तीय सुविधाएं भी शुरू की हैं, जो MSEs को उनके पक्के खरीद आदेशों (purchase orders) के बदले बिना किसी गारंटी के वर्किंग कैपिटल (working capital) लोन दिलाने में मदद करती हैं। इस पहल का उद्देश्य उन नकदी की कमी की समस्याओं को दूर करना है जिनका सामना छोटे विक्रेता सरकारी अनुबंधों में लंबी भुगतान अवधि के कारण करते हैं।
निवेशकों के लिए खास ध्यान
यह समझना ज़रूरी है कि GeM वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत एक गैर-लाभकारी, सरकारी मंच है। यह कोई सूचीबद्ध (listed) कंपनी नहीं है और इसका कोई शेयर (stock) नहीं है। निवेशकों को 'GeM' नाम वाली सूचीबद्ध कंपनियों, जैसे Gem Aromatics Limited, से इसे भ्रमित नहीं करना चाहिए, जो स्पेशलिटी केमिकल्स जैसे अलग-अलग सेक्टर में काम करती हैं। भविष्य में, इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार उन सूचीबद्ध कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन (operating margins) और ऑर्डर बुक को कैसे प्रभावित करता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा जो सरकार को सामान और सेवाएं सप्लाई करती हैं।
