594 किलोमीटर लंबे Ganga Expressway के उन्नाव हिस्से में फिर से दरारें सामने आई हैं। महज एक महीने में यह पांचवीं बार है जब सड़क को मरम्मत की जरूरत पड़ी है, जिससे निर्माण की गुणवत्ता पर बड़े सवाल उठ रहे हैं।
फिर सवालों के घेरे में प्रोजेक्ट
594 किलोमीटर लंबा यह हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट एक बार फिर जांच के दायरे में है। उन्नाव के पास सड़क के उस हिस्से में फिर से दरारें देखी गई हैं, जहां सिर्फ एक हफ्ते पहले ही इमरजेंसी रिपेयरिंग का काम पूरा किया गया था। इससे पहले 18 अगस्त को मेरठ-प्रयागराज कैरिजवे पर 10 मीटर गहरा गड्ढा होने की घटना ने सबको हैरान कर दिया था।
निर्माण लागत और चुनौतियां
₹36,230 करोड़ की लागत से बना यह प्रोजेक्ट उत्तर प्रदेश के 12 जिलों को जोड़ता है। हालांकि, मानसून के दौरान मिट्टी धंसने और जल निकासी (Drainage) की समस्याओं के कारण सड़क की सतह टिक नहीं पा रही है। चूंकि यह प्रोजेक्ट 2026 की शुरुआत में ही शुरू हुआ था, इसलिए इतनी जल्दी बार-बार मरम्मत का काम न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह प्रोजेक्ट की लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक्स के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के जानकारों का मानना है कि बार-बार होने वाली ये मरम्मत न केवल मेंटेनेंस लागत को बढ़ाती है, बल्कि कॉन्ट्रैक्टर्स और सरकारी अथॉरिटीज की साख (Reputation) पर भी आंच लाती है। अब सबकी निगाहें सरकारी ऑडिट पर हैं, जिससे यह साफ होगा कि क्या यह कोई स्थानीय समस्या है या फिर इंजीनियरिंग डिजाइन में ही कोई बड़ी खामी है। भविष्य में अगर सरकार क्वालिटी नॉर्म्स को और सख्त करती है, तो कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए काम पूरा करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
