प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म InGovern का कहना है कि Fortis Healthcare आज भी पुराने प्रमोटर्स के कारण कानूनी और साख संबंधी दबाव झेल रही है, जबकि मौजूदा मैनेजमेंट का 2016 के विवादों से कोई लेना-देना नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म InGovern ने अपनी हालिया रिपोर्ट में साफ किया है कि Fortis Healthcare पर चल रहा फॉरेंसिक ऑडिट कंपनी के लिए बेवजह का ऑपरेशनल और रिप्यूटेशनल बोझ बना हुआ है। यह पूरा मामला 2016 में कंपनी के पूर्व प्रमोटर्स, मलविंदर और शिविंदर सिंह के फैसलों से जुड़ा है।
दिल्ली हाईकोर्ट का रुख
दिल्ली हाईकोर्ट ने जिस फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया है, वह केवल एक 'फैक्ट-फाइंडिंग' एक्सरसाइज है। इसका उद्देश्य एक दशक पुरानी घटनाओं और शेयर मूवमेंट की जांच करना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह जांच मौजूदा कंपनी या उसके वर्तमान लीडरशिप टीम के खिलाफ कोई दोषारोपण नहीं है।
रिकवरी के लिए संघर्ष
2018 में सिंह ब्रदर्स के जाने के बाद, कंपनी ने खुद को पूरी तरह से बदला है। IHH Healthcare ने उस समय ₹4,000 करोड़ का निवेश कर कंपनी को दिवालिया होने से बचाया था। आज कंपनी उन ₹400 करोड़ को वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है, जो पुराने मैनेजमेंट के समय में कंपनी से कथित तौर पर बाहर भेजे गए थे।
निवेशकों के लिए टेकअवे
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उस पर कोई सीधा वित्तीय दायित्व (Monetary Liability) नहीं है। हालांकि, कानूनी प्रक्रियाओं के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव कामकाज पर दबाव बना हुआ है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कंपनी अब खुद एक विक्टिम की तरह काम कर रही है जो अपने पुराने घावों को भरने की कोशिश में जुटी है।
