दिल्ली में लगभग 1,000 विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMGs) FMGE (Foreign Medical Graduate Examination) जून 2026 के कम पास प्रतिशत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। एक सरकारी समिति ने परीक्षा की फ्रीक्वेंसी बढ़ाने पर सहमति जताई है, लेकिन ग्रेस मार्क्स देने से इनकार कर दिया है। यह स्थिति भारत में डॉक्टरों की सप्लाई को प्रभावित कर सकती है।
AIIMS के पास जमा हुए 1,000 से ज्यादा FMGs
नई दिल्ली में एक बड़ा प्रोटेस्ट देखने को मिल रहा है, जहाँ करीब 1,000 विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMGs) जून 2026 में हुए फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) में सिस्टमैटिक सुधार की मांग कर रहे हैं। AIIMS के पास इकट्ठा हुए ये प्रदर्शनकारी, हालिया परीक्षा में सिर्फ 12.38% पास प्रतिशत दर्ज होने के बाद ट्रांसपेरेंसी की मांग कर रहे हैं। यह विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBEMS) और परीक्षा देने वाले छात्रों के बीच बढ़ती खाई को दर्शाता है।
परीक्षा के पैटर्न पर उठा सवाल
छात्रों का कहना है कि जून की परीक्षा में अचानक वीडियो-आधारित क्लिनिकल सवालों को शामिल किया गया, जिसकी उन्हें कोई पूर्व सूचना नहीं थी। भारत में प्रैक्टिस करने के लिए FMGE पास करना अनिवार्य है, और इतने कम पास प्रतिशत से उनके करियर पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। NBEMS, जो स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था है, के इस फैसले का शेयर बाजार पर सीधा असर नहीं है, लेकिन यह चिकित्सा क्षेत्र और डॉक्टरों की उपलब्धता पर निश्चित रूप से प्रभाव डालेगा।
समिति की सिफारिशें और NBEMS का जवाब
छात्रों की चिंताओं को दूर करने के लिए NBEMS द्वारा गठित तीन-सदस्यीय समिति ने परीक्षा प्रक्रिया की समीक्षा की है। समिति ने FMGE को साल में तीन बार आयोजित करने का सुझाव दिया है ताकि छात्रों को अधिक मौके मिल सकें। इसके अलावा, परीक्षा के दौरान बायोमेट्रिक टाइम-कीपिंग में सुधार के सुझाव भी दिए गए हैं। हालांकि, NBEMS ने छात्रों की ग्रेस मार्क्स या वर्तमान नतीजों के पुनर्मूल्यांकन की मांग को आधिकारिक तौर पर ठुकरा दिया है। बोर्ड का कहना है कि मेडिकल योग्यता सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा स्कोरिंग मानक ही उचित हैं।
इंटर्नशिप सीटों का संकट
सिर्फ परीक्षा पैटर्न और नतीजों का मुद्दा ही नहीं है, बल्कि यह मामला विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स के सामने आने वाली बड़ी सिस्टमैटिक दिक्कतों को भी उजागर करता है। भारत के मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता एक बड़ा मुद्दा है। उदाहरण के तौर पर, विदेशी ग्रेजुएट्स के लिए इंटर्नशिप सीटों का केवल 7.5% का कोटा है, जो पास होने के बाद भी अनिवार्य ट्रेनिंग पूरी करने वाले छात्रों की संख्या को सीमित करता है। इस वजह से, सफल उम्मीदवार भी कार्यबल में शामिल होने में देरी का सामना करते हैं, जो अंततः डॉक्टरों की कुल सप्लाई को प्रभावित करता है।
आगे क्या?
चूंकि छात्रों की ग्रेस मार्क्स की मांगें ठुकरा दी गई हैं, इसलिए यह गतिरोध जारी रहने की संभावना है। छात्र संगठन पारदर्शिता की कमी के लिए नियामक को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश में मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जा सकते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि NBEMS, परीक्षा को साल में तीन बार आयोजित करने की नीति को कैसे लागू करता है और क्या इससे छात्रों का दबाव कम होगा, या फिर इंटर्नशिप सीटों की कमी को दूर करने के लिए और अधिक नियामक कार्रवाई की आवश्यकता होगी।
