भारत के फूड सेफ्टी अथॉरिटीज (FSSAI) ने मार्केटिंग दावों और हाइजीन स्टैंडर्ड्स पर अपनी सख्ती बढ़ा दी है, जिसका सीधा असर Dabur और Nestlé जैसी बड़ी कंपनियों पर पड़ रहा है। इंडस्ट्री की ओर से इस सख्ती पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि निवेशकों के लिए ऑपरेशनल और कंप्लायंस के रिस्क बढ़ गए हैं।
Dabur और Nestlé की बढ़ी मुश्किलें
भारत में फूड और बेवरेज कंपनियों के लिए नियम-कानून कड़े होते जा रहे हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) और राज्य स्तरीय रेगुलेटर्स प्रोडक्ट लेबलिंग, मार्केटिंग दावों और हाइजीन पर अपनी जांच तेज कर रहे हैं। लोगों की ओर से क्वालिटी कंट्रोल की मांग बढ़ने के चलते यह कदम उठाया गया है।
Dabur India Ltd को हाल ही में FSSAI से एक प्रोहिबिशन ऑर्डर मिला है। रेगुलेटर ने कंपनी को '100% प्योर' या '100% ऑर्गेनिक' जैसे दावे वाले कुछ फूड प्रोडक्ट्स की बिक्री रोकने का निर्देश दिया है। FSSAI का कहना है कि ये दावे ग्राहकों को गुमराह कर सकते हैं और 2018 के एडवरटाइजिंग एंड क्लेम्स रेगुलेशंस का उल्लंघन करते हैं। कंपनी ने कहा है कि वह लीगल सलाह ले रही है और अपने प्रोडक्ट लेबल्स को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इससे पहले, Dabur को US FDA से 24 जुलाई, 2026 को इसके सिलवासा मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के क्वालिटी कंट्रोल को लेकर एक चेतावनी पत्र भी मिला था।
वहीं, Nestlé India भी हाल में जांच के दायरे में आई है। जून 2026 में, कंपनी को FSSAI से एक नोटिस मिला था जिसमें मैगी नूडल्स के पैकेट में कीड़े मिलने का आरोप था। Nestlé ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि इंटरनल और एक्सटर्नल टेस्टिंग में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। हालांकि, ऐसे आरोप लगने से कंपनी की वैल्यूएशन पर दबाव आ सकता है, जैसा कि हाल ही में कंज्यूमर-फेसिंग शेयर्स में गिरावट देखी गई है।
हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का विरोध
पैकेज्ड फूड्स के अलावा, हॉस्पिटैलिटी सेक्टर भी राज्य स्तरीय अथॉरिटीज के साथ टकराव का सामना कर रहा है। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने हाइजीन संबंधी चिंताओं के चलते कई रेस्टोरेंट्स और क्लब्स को अस्थायी रूप से बंद करने के लिए गहन निरीक्षण अभियान चलाया है। इससे होटल और रेस्टोरेंट एसोसिएशन नाराज हैं। इंडस्ट्री बॉडीज ने सरकार से शिकायत की है कि नियमों का पालन कराने का तरीका सही नहीं है और तुरंत बंद करने से पहले कंपनियों को सुधार का मौका नहीं दिया जा रहा। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी कुछ मामलों में हस्तक्षेप किया है और कहा है कि लाइसेंस सस्पेंड करने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, जिसमें सुधार नोटिस जारी करना शामिल हो।
निवेशकों के लिए क्या है खास
निवेशकों के लिए, ये घटनाएं भारतीय फूड सेक्टर में कड़े कंप्लायंस की ओर एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। मुख्य रिस्क में री-लेबलिंग का खर्चा, ऑपरेशनल दिक्कतें और नकारात्मक प्रचार का असर शामिल हैं। जब कंपनियों को मार्केटिंग दावों को बदलना पड़ता है या अचानक फैसिलिटी इंस्पेक्शन का सामना करना पड़ता है, तो इससे उनके प्रॉफिट मार्जिन और सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है। शेयरधारकों को यह देखना होगा कि कंपनियां लेबलिंग में बदलाव को कितनी कुशलता से संभालती हैं और इंडस्ट्री कैसे रेगुलेटर्स के साथ मिलकर सुरक्षा मानकों और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाती है।
