फूड मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां कच्चे माल की खरीद के लिए आज भी पुराने और मैनुअल तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। इससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर बुरा असर पड़ रहा है। दिसंबर 2026 तक सख्त होते ग्लोबल नियमों के कारण, जो कंपनियां अपने रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम को अपडेट नहीं करेंगी, उन्हें भारी वित्तीय नुकसान और रेगुलेटरी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
मुनाफे में क्यों आ रही है गिरावट?
भारतीय फूड मैन्युफैक्चरर्स के लिए रॉ-मटीरियल की कीमतों को ट्रैक करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। ज्यादातर कंपनियां अभी भी एक्सेल स्प्रेडशीट जैसे पुराने तरीकों पर निर्भर हैं, जिससे फाइनेंशियल रिपोर्टिंग में बड़ी खामियां रह जाती हैं। जब प्रोक्योरमेंट डेटा कोर अकाउंटिंग सिस्टम से नहीं जुड़ता, तो असल में 'कॉस्ट ऑफ गुड्स सोल्ड' (COGS) की सटीक गणना करना नामुमकिन हो जाता है। इसका नतीजा तिमाही नतीजों में ग्रॉस मार्जिन में गिरावट के रूप में दिखता है।
हेजिंग (Hedging) की जटिलताएं
एडिबल ऑयल या अनाज जैसी कमोडिटी का दाम सिर्फ मार्केट प्राइस से तय नहीं होता। इसमें शिपिंग, मिलिंग और कन्वर्जन जैसे खर्च भी शामिल होते हैं, जो अक्सर पब्लिक एक्सचेंज पर ट्रेड नहीं होते, इसलिए इनकी हेजिंग करना मुश्किल होता है। कंपनियों के पास सही डेटा न होने से उनकी हेजिंग स्ट्रेटजी फेल हो जाती है, जिससे हर तिमाही मुनाफे पर सीधा असर पड़ता है।
ग्लोबल रेगुलेशन और रिस्क
दिसंबर 2026 से यूरोपीय संघ (EU) जंगलों की कटाई (deforestation) को लेकर नए और सख्त नियम लागू करने जा रहा है। इन नियमों के तहत कंपनियों को रॉ-मटीरियल के सटीक स्रोत का रिकॉर्ड देना होगा। मैनुअल सिस्टम इन जटिल ऑडिट ट्रेल को संभालने के लिए सक्षम नहीं हैं। जो कंपनियां तकनीक में बदलाव नहीं करेंगी, उनके लिए इंटरनेशनल मार्केट में टिकना मुश्किल हो सकता है।
भारतीय बाजार के लिए चेतावनी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 56% एडिबल ऑयल इंपोर्ट करता है। ग्लोबल सप्लाई चेन पर इतनी निर्भरता के कारण, डेटा को एक सिंगल, रिलायबल सिस्टम से न जोड़ना बड़ी जोखिम की बात है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे उन कंपनियों पर नजर रखें जो डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और प्रोक्योरमेंट मॉडर्नाइजेशन पर जोर दे रही हैं। भविष्य में उन्हीं कंपनियों का मुनाफा सुरक्षित रहेगा जो सप्लाई चेन में पारदर्शिता लाएंगी।
