F&O ट्रेडर्स को डेरीवेटिव्स से होने वाले मुनाफे को कैपिटल गेन नहीं, बल्कि बिजनेस इनकम के तौर पर दिखाना होगा। सही टर्नओवर कैलकुलेशन टैक्स ऑडिट की जरूरत को समझने और 31 अगस्त या 31 अक्टूबर की डेडलाइन को पूरा करने के लिए ज़रूरी है। घाटे वाले साल में भी रिटर्न फाइल करना भविष्य के मुनाफे के साथ लॉस को एडजस्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है।
F&O ट्रेडर्स के लिए टैक्स फाइलिंग की जरूरी बातें
जैसे-जैसे असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27 के लिए 14 जुलाई, 2026 की डेडलाइन नजदीक आ रही है, फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) मार्केट में एक्टिव ट्रेडर्स को इनकम टैक्स फाइलिंग के लिए कुछ खास नियमों का पालन करना होगा। लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के लिए रखे गए स्टॉक्स के विपरीत, जिनसे कैपिटल गेन होता है, F&O ट्रांजैक्शन्स से होने वाले मुनाफे और घाटे को इनकम टैक्स एक्ट के तहत 'नॉन-स्पेकुलेटिव बिजनेस इनकम' माना जाता है।
टर्नओवर कैलकुलेशन क्यों तय करती है आपकी डेडलाइन?
F&O ट्रेडर के लिए सबसे अहम कदम है अपने टर्नओवर की सही-सही गणना करना, क्योंकि यही तय करता है कि टैक्स ऑडिट की जरूरत है या नहीं। इनकम टैक्स के स्टैंडर्ड गाइडलाइन्स के मुताबिक, टर्नओवर की गणना में स्क्वेयर-ऑफ (Squared-off) किए गए सभी ट्रेड्स के मुनाफे और घाटे के कुल एब्सोल्यूट (Absolute) अमाउंट को जोड़ा जाता है, साथ ही ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स से मिले कुल प्रीमियम को भी शामिल किया जाता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि फाइनेंशियल ईयर के अंत तक ओपन (Open) रखे गए ट्रेड्स को तब तक टर्नओवर कैलकुलेशन में शामिल नहीं किया जाता, जब तक वे क्लोज न हो जाएं।
जिन ट्रेडर्स का टर्नओवर निर्धारित सीमा से अधिक होता है, उन्हें टैक्स ऑडिट करवाना अनिवार्य होता है। ऐसे लोगों के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की डेडलाइन 31 अक्टूबर है। वहीं, जिन ट्रेडर्स का टर्नओवर ऑडिट लिमिट से कम रहता है, उनके लिए फाइलिंग की सामान्य डेडलाइन 31 अगस्त है। अगर ट्रेड्स को सही ढंग से कैटेगराइज नहीं किया गया या टर्नओवर की गलत गणना की गई, तो सही ITR फॉर्म चुनने में गलती हो सकती है और लेट फाइलिंग पर पेनल्टी भी लग सकती है।
भविष्य के फायदों के लिए घाटे को आगे ले जाना
कई ट्रेडर्स यह गलत धारणा रखते हैं कि अगर उन्हें अपने F&O बिजनेस में नेट लॉस हुआ है, तो उन्हें ITR फाइल करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, ऐसे मामलों में रिटर्न फाइल करने की जोरदार सलाह दी जाती है। समय पर इन लॉसेस को रिपोर्ट करके, ट्रेडर्स इन्हें अगले आठ असेसमेंट इयर्स तक के लिए कैरी फॉरवर्ड (Carry Forward) कर सकते हैं। इन कैरी फॉरवर्ड लॉसेस का इस्तेमाल भविष्य के सालों में बिजनेस प्रॉफिट को एडजस्ट (Adjust) करने के लिए किया जा सकता है, जिससे प्रॉफिट वाले सालों में कुल टैक्स का बोझ कम हो जाता है।
निवेशकों और ट्रेडर्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे हर ट्रेड का विस्तृत रिकॉर्ड रखें, जिसमें ब्रोकरेज चार्जेज और अन्य ट्रांजैक्शन से जुड़े खर्च शामिल हों, क्योंकि ये डिडक्टिबल बिजनेस एक्सपेंस (Deductible Business Expenses) होते हैं। फाइलिंग की डेडलाइन नजदीक आने पर, किसी योग्य टैक्स एडवाइजर या अकाउंटेंट से सलाह लेना यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि टर्नओवर की गणना सही तरीके से हो और सभी योग्य बिजनेस एक्सपेंस को ट्रेडिंग इनकम के मुकाबले क्लेम किया जा सके।
